Saturday, 22 June 2013

मर्यादा पुरूषोत्तम राम और असुर सम्राट रावण की जन्मकुंडली का विश्लेषण

भगवान श्रीराम और असुर सम्राट रावण की जन्म कुंडली में काफी समानताएं होते हुए भी ग्रहों के शुभाशुभ प्रभाव ने दोनों में से एक को मर्यादा पुरूषोत्तम बनाया, जबकि दूसरा [रावण] आसुरी प्रवृत्तियों का पर्याय बनकर बुराई का प्रतीक बन गया।
भगवान राम व असुर सम्राट रावण का जन्म लग्न चर राशि का है। श्रीराम की कुंडली में चारों केंद्रों में उच्च के ग्रह होकर पंच महापुरूष योग का निर्माण कर रहे हैं। बृहस्पति से हंस योग, शनि से शश योग, मंगल से रूचक योग का निर्माण हो रहा है। रावण की कुंडली में भी पंच महापुरूष बन रहे हैं। श्रीराम के पांच ग्रह उच्च के हैं, तो रावण की कुंडली में भी पांच ग्रह उच्च के हैं।

भगवान श्री रामचंद्र जी की  जन्मकुंडली 
लंकापति रावन की जन्मकुंडली

श्रीराम की जन्मकुंडली एवं जीवन चक्र राम का जन्म कर्क लग्न में हुआ था। कर्क लग्न व्यक्ति के सत्कर्मी, निष्कलंक और यशस्वी होने का परिचायक है। कर्क लग्न के साथ-साथ यदि लग्नेश चंद्र भी लग्न में हो, तो जातक समृद्ध, सुसंस्कृत, न्यायप्रिय, सत्यनिष्ठ, क्षमाशील और विद्वान होता है। वह भाग्यशाली तथा जीवन में उच्च स्थान को प्राप्त करने वाला होता है। उसे देश-विदेश में सम्मान की प्राप्ति होती है। कर्क लग्न में चंद्र के साथ गुरु भी इसी भाव में स्थित हो, तो व्यक्ति सत्यनिष्ठ व न्यायप्रिय है और उसका व्यवहार मृदु होता है। कर्क राशि में गुरु के उच्चस्थ होने के कारण जातक जीवन-मूल्यों की प्रतिष्ठा बनाये  रखने के लिए कोई भी बलिदान कर सकता है। ऐसा व्यक्ति ऐसी अदृश्य ढाल से युक्त होता है जिसे खरौंच तक भी नहीं लगती। वह आत्म सम्मान को विश्व की सकल संपदा से भी अधिक समझता है। इसी कर्क लग्न में अवतरित भगवान राम में ये सारे गुण विद्यमान थे। इसीलिए वह मर्यादा पुरुषोत्तम राम कहलाए। भगवान राम की कुंडली में मंगल के सप्तम भाव में उच्चस्थ होने के कारण उनका विवाह माता सीता जैसी दिव्य कन्या से हुआ। कुंडली में मंगल स्थित राशि मकर का स्वामी शनि भी उच्चस्थ है तथा शनि स्थित राशि का स्वामी शुक्र भी उच्चस्थ है। शुक्र पत्नी का प्रतिनिधि ग्रह है। अतः भगवान राम का माता सीता जैसी दिव्य कन्या से विवाह होना स्वाभाविक है। भगवान राम की जन्म कुंडली में मंगल सप्तम भाव में होने से मंगलीक है। किंतु उसके उच्च राशिस्थ होने से उसका दोष निष्प्रभावी तो रहा किंतु सप्तम् भाव एवं उसके कारकेश शुक्र पर राहु की दृष्टि और केतु की स्थिति तथा सप्तम् भाव में विध्वंसक मंगल की स्थिति के कारण पत्नी वियोग का दुख झेलना पड़ा। शनि, मंगल व राहु की दशम् भाव एवं सूर्य पर दृष्टि पिता की मृत्यु का कारण बनी। शनि की चतुर्थ भाव में स्थिति और चंद्र एवं चंद्र राशि कर्क पर दृष्टि के कारण माताओं को वैधव्य देखना पड़ा। छोटे भाई का प्रतिनिधि ग्रह मंगल सप्तम् भाव में उच्च का है और उस पर गुरु की दृष्टि है, जिसके फलस्वरूप छोटे भाइयों ने भगवान राम की पत्नी अर्थात माता सीता को माता का आदर दिया। उच्च के ग्रह से हंस योग, शनि से शश योग, मंगल से रुचक योग और चंद्र के लग्न में होने के फलस्वरूप गजकेसरी योग है। गुरु और चंद्र के प्रबल होने के कारण यह गजकेसरी योग अत्यंत प्रबल है। पुनर्वसु के अंतिम चरण में होने से चंद्र स्वक्षेत्री  है। अतः भगवान श्री राम के सामने जो भी कठिनाइयां आईं उनका उन्होंने सफलतापूर्वक सामना किया। पांच ग्रहों के उच्च के होने के कारण भगवान अवतारी पुरुष हुए। चंद्र और लग्न के बली गुरु से प्रभावित होने के कारण भगवान ने मर्यादाओं का पालन किया। महर्षि वाल्मीकी के भगवान राम के जन्मचक्र के वर्णन में राहु, केतु एवं बुध की स्थिति का ज्ञान नहीं होता। किंतु भगवान राम के जीवन चरित्र के अनुसार अनुमान लगाया जा सकता है कि ये ग्रह किस भाव एवं किस राशि में होंगे। भगवान राम अत्यंत प्रतापी हुए। इससे पता चलता है कि उनकी जन्मकुंडली में राहु की स्थिति तृतीय भाव कन्या राशि में होगी क्योंकि तृतीय भाव का राहु जातक को पराक्रमी एवं प्रतापी बनाता हैं। इसके अनुसार केतु नवम् भाव में उच्च के शुक्र से युत है। इसी शुक्र के कारण भगवान राम के पराक्रमी एवं प्रतापी बनने में उनकी पत्नी माता सीता माध्यम एवं कारण बनीं। पंचमेश मंगल के पंचम से तीसरे स्थान पर होने के कारण भगवान राम के पुत्र भी अत्यंत पराक्रमी हुए। बुध एवं शुक्र कभी भी सूर्य से 28 अंश से अधिक दूरी पर नहीं जाते इसलिए दोनों को सूर्य के साथ अथवा इर्द-गिर्द ही माना जाएगा। भगवान राम के जीवन चरित्र के अनुसार शुक्र को नवम् भाव के मीन राशि में होना उपयुक्त माना जाएगा। बुध निर्बल ग्रह है। किंतु बृषभ राशि में होने पर वह निर्बल नहीं रह जाता क्योंकि बृषभ राशि का स्वामी शुक्र बुध का मित्र है जो उच्च राशिस्थ है और जिस राशि में वह है उसका स्वामी गुरु भी लग्न में उच्च राशिस्थ है। यहीं पर ग्रहों की शृंखला समाप्त होती है। इसके अलावा बुध द्वादश भाव का स्वामी है और द्वादश भाव से द्वादश होने के कारण अति बली है। अत्यंत बली बुध की राशि कन्या में राहु की स्थिति ने ही भगवान राम को पराक्रमी बनाया। लग्नेश भाग्येश का योग और उन पर पंचमेश, सप्तमेश और दशमेश की दृष्टि से प्रबल राजयोग बना। उच्च का सुखेश शुक्र भाग्य स्थान में है और उस पर भाग्येश गुरु की दृष्टि है। इन्हीं योगों के कारण भगवान चक्रवर्ती सम्राट बने। चतुर्थेश शुक्र के उच्च होने के कारण भगवान राम सांसारिक हुए। चतुर्थ भाव से शनि की दृष्टि लग्न स्थित गुरु पर होने के कारण वह वैरागी हुए अर्थात् सत्ता  के अधिकारी होते हुए भी वह वैरागी राजा सिद्ध हुए। चंद्रमा पुनर्वसु नक्षत्र के चतुर्थ चरण में है जिसके कारण उनका जन्म गुरु की 16 वर्षों की महादशा में हुआ। पुनर्वसु नक्षत्र के चतुर्थ चरण में जन्म होन के कारण गुरु की महादशा शेष अधिक से अधिक चार वर्ष रही होगी। तत्पश्चात् शनि की महादशा 19 वर्ष की आई जो 23 वर्ष की आयु तक चली। पुराणों के अनुसार भगवान श्री राम का विवाह 18 वर्ष की आयु में हुआ। उस समय सप्तमेश शनि की महादशा और अंतर्दशा स्वामी गोचर का गुरु सप्तम् स्थान में था। पुराणों के अनुसार 27 वर्ष की आयु में भगवान को चैदह वर्षों का बनवास हुआ और उनके वियोग में उनके पिता महाराज दशरथ का स्वर्गवास हुआ। उस समय भगवान श्री राम बुध की महादशा के प्रभाव में थे। बुध तृतीयेश एवं व्ययेश होने के कारण कष्टकारक था। गोचर में सिंह का शनि दूसरे भाव में था। यह साढ़े साती का अंतिम चरण था। गुरु चंद्रमा से चैथी राशि तुला में था। यह बुध तृतीयेश षष्ठेश पिता के भाव से होकर दूसरे भाव में था। अतः पिता के लिए मारक था और भगवान राम तथा कुटुंब के लिए कष्टकारक था। बुध की दशा में ही सीताहरण हुआ। व्ययेश की दशा में शय्या सुख का नाश होता है और कष्टकारक यात्रा होती है। केतु के नवम् भाव में स्वक्षेत्री होने के कारण लंका विजय करके पुनः अयोध्या के सम्राट बने। जैमिनि ज्योतिष के अनुसार लग्नेश और अष्टमेश यदि चर राशि के होते हैं तो जातक दीर्घायु होता है। भगवान श्री राम का लग्नेश चंद्र चर राशि का है तथा अष्टमेश शनि भी तुला राशि में चर राशि का है। लग्न में गुरु व चंद्र के बली होने के फलस्वरूप भगवान ने अमित आयु प्राप्त की और इसका सदुपयोग भी किया। इस प्रकार ग्रहों की शुभाशुभ स्थिति के फलस्वरूप मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने अनेक कष्ट झेले, रावण जैसे शत्रु पर विजय प्राप्त की और राम राज्य की स्थापना की।


लंकापति रावण की जन्मकुंडली का विश्लेषण - लकापति रावण की कुंडली का विवेचन इस प्रकार है। रावण की जन्म कुंडली में लग्नेश सूर्य के लग्न में स्थित होने तथा नैसर्गिक शुभ ग्रह गुरु के भी लग्न में होने के कारण लग्न अति बलवान था। लग्न बलवान हो, तो व्यक्ति सुखी और समृद्ध होता है। उसका आत्मबल भी उच्च कोटि का था। लग्नस्थ सूर्य पर क्रूर ग्रह मंगल की दृष्टि होने के कारण वह अहंकारी और तानाशाह प्रवत्ति  का था। कुंडली के द्वितीय भाव में लाभेश और धनेश बुध की उसकी अपनी ही स्वयं की राशि में स्थिति के कारण धनयोग का निर्माण हो रहा है। इस कारण वह अतुलित धन सम्पत्ति का स्वामी था। तृतीय भाव का स्वामी शुक्र दशम भाव में है, और यहां उसकी राशि तुला में केतु और स्त्री भाव का स्वामी शनि बैठे हैं। इसी कारण वह बहुत विलासप्रिय रहा होगा। भ्रातृ भाव त्रत्तीय  स्थान प्रथकतावादी ग्रह उच्च का शनि केतु के साथ स्थित है। एक अन्य पृथकतावादी ग्रह है और दूसरा विच्छेदात्मक ग्रह राहु की दृष्टि भ्रातृ भाव पर है। इस कारण रावण को अपने ही भाई विभीषण के विरोध का सामना करना पड़ा और वह उसका शत्रु बन गया। पंचमेश गुरु के पंचम से नवम् भाव में और जन्मकुंडली के लग्न स्थान में स्थित होने तथा लग्न से अपने ही भाव,विद्या , बुद्धि, संतान को पूर्ण दृष्टि से देखने के कारण वह अनेक पुत्रों वाला, विद्यावान, बुद्धिमान और शास्त्रज्ञ था। लग्न में लग्नेश सूर्य और पंचमेश की युति गुरु ने रावण को प्रख्यात ज्योतिषाचार्य बनाया। गुरु की दूसरी राशि अष्टम में होने के कारण तथा अष्टमेश गुरु अष्टम स्थान से षष्ठ स्थान में स्थित है और पंचम भाव पर शनि की दृष्टि है। यह सारी स्थिति अंत में रावण की विद्या-बुद्धि के विनाश कारण बनी। अतः विनाशकाल के समय उसकी बुद्धि विपरीत हो गई थी। भाग्य भाव नवम स्थान में राहु की उपस्थिति के कारण रावण का भाग्य बलवान था। मंगल की राशि मेष में स्थित राहु पर उच्च के शनि की पूर्ण दृष्टि है। इस कारण वह सफल राजनीतिज्ञ व कूटनीतिज्ञ बना तथा इसी योग के कारण उसमें नेतृत्व करने की अपूर्व क्षमता भी थी। नवम् भाव का कारक गुरु है। यह भाव धर्म भाव भी कहलाता है। ऐसे स्थान में पापग्रह राहु के स्थित होने से रावण भगवान् राम का विरोधी था। राज्येश शुक्र के राज्य भाव   दसम  स्थान में होने के कारण रावण का शासन पक्ष बहुत मजबूत था। इसलिए दीर्घकाल तक उसने विशाल राज्य का पूर्ण सुख भोगा। लग्नेश और पंचमेश का युति संबंध भी राज योग का निर्माण करता है। रावण के जन्म चक्र में ग्रहों का राजा सूर्य लग्नेश होकर स्वयं लग्न में पंचमेश गुरु के साथ बैठा है। राशि मकर थी। यह वैश्य राशि है और इसका स्वामी शनि शूद्र वर्ण का ग्रह है। अतः रावण सत्गुणी ब्राह्मण नहीं था। वह रजोगुण प्रधान था। आयु भाव का स्वामी (अष्टमेश) गुरु लग्नेश सूर्य के साथ देह भाव में स्थित है मारकेश बुध मारक भाव में स्थित है। सप्तमेश शनि के पराक्रम भाव में और गुरु के केंद्र स्थान में होने से कक्षा वृद्धि हो रही है। रावण की जन्मकुंडली के लग्न में स्थिर राशि और अष्टम में द्विस्वभाव राशी होने से दीर्घ आयु योग है। कक्ष्या वृद्धि होने के कारण यह परम आयु योग बन गया है। इस योग के कारण ही रावण लगभग 10,000 वर्ष तक जीवित रहा।त्रेतायुग में मनुष्य की अधिकतम आयु दस हजार वर्ष ही थी  रावण के पतन का कारण षष्ठ भाव में चंद्र और मंगल की युति है। षष्ठ भाव को शत्रु स्थान भी कहा जाता है। यहां व्ययेश चंद्र के साथ मंगल स्थित है। सिंह लग्न के लिए मंगल जिस भाव में स्थित होता है, उसकी वृद्धि करता है। चंद्र स्त्री ग्रह है और रावण की कुंडली में व्ययेश भी है, इसलिए एक स्त्री अर्थात सीताजी उसके साम्राज्य के पतन और उसकी मृत्यु का कारण बनीं। शत्रु भाव में मंगल की उच्च राशि मकर तथा अष्टम भाव में गुरु की राशि होने के कारण मर्यादा पुरुषोŸाम भगवान श्रीराम के हाथों रावण की मृत्यु हुई। एक प्रकार से यह ब्रह्म सामीप्य मुक्ति है। राम ने रावण की नाभि में स्थित अमृत में अग्निबाण मारा था। चंद्र अमृत और मंगल अग्नि बाण का प्रतीक है। धनेश के प्रबल त्रिषडायेश होकर कुटुंब भावस्थ होने के कारण धन, कुटुंब, पुत्रादि की हुई। रावण ब्राह्मण था। किंतु ज्योतिष शास्त्र इसे स्वीकार्य नहीं करता क्योंकि सिंह लग्न वाला व्यक्ति रजोगुणी होता है। इस लग्न का स्वामी सूर्य क्षत्रिय वर्ण का है। यदि हम चंद्र राशि के आधार पर देखें तो रावण की राशि मकर थी। यह वैश्य राशि है और इसका स्वामी शनि शूद्र वर्ण का ग्रह है। अतः रावण सत्गुणी ब्राह्मण नहीं था। वह रजोगुण प्रधान था। कब हुआ था रावण का वध गहन अनुसंधान और गणना के अनुसार आज से लगभग 1 करोड़ 81लाख वर्ष पूर्व 24वें महायुग के त्रेता में भगवान श्रीराम ने लंकापति रावण का वध किया था।  इस दिन दस सिर वाले दशानन रावण का वध हुआ था इसलिए इसका नाम दशहरा पड़ा। इस दिन भगवान राम ने भगवती विजया (अपराजिता देवी) का विधिवत् पूजन करके लंका पर विजय प्राप्त की थी। इसलिए इस पर्व का नाम विजयादशमी पड़ा। विजयादशमी के दिन विजया देवी की पूजा होती है। विजया दशमी के दिन जब रामचंद्र जी लंका पर चढ़ाई करने जा रहे थे उस समय शमी वृक्ष ने उनकी विजय का उद्घोष किया था। समुद्र का पानी मीठा नहीं कर सका लंकेश्वर श्री वाल्मीकि रामायण कालीन पौराणिक इतिहास के अनुसार रावण लगभग दस हजार वर्षों तक जीवित रहा। उसमें अनंत शक्ति, शौर्य, प्रतिभा और ज्ञान था। किंतु उसने इतने दीर्घ जीवनकाल में अपनी असीमित शक्तियों का दुरुपयोग ही किया, मानव कल्याण हेतु उनका कभी सदुपयोग नहीं किया। मरते समय उसे इस बात का बहुत पश्चाताप और दुःख था। मरणासन्न अवस्था में उसने लक्ष्मण जी से कहा था कि वह स्वर्ग जाने हेतु सीढ़ियों का निर्माण करना, स्वर्ण जैसी बहुमूल्य धातु में सुगंध भरना तथा समुद्र के पानी का खारापन दूर करके उसे पीने योग्य बनाना चाहता था। किंतु उसने समय का सदुपयोग नहीं किया इसलिए मेरी ये इच्छाएं अधूरी रह गईं। मध्यप्रदेश के मंदसौर नगर में रावण की ससुराल थी। उसकी पटरानी मन्दोदरी मन्दसौर के राजा की पुत्री थी। इस कारण आज भी मन्दसौर जिले में रावण दहन नहीं किया जाता है। कुछ लोग यहां रावण की पूजा भी करते हैं। रावण ब्राह्मण होने के साथ-साथ शास्त्रों का ज्ञाता भी था। इसके बावजूद उसे हिन्दू धर्म में आदर्श पुरुष नहीं माना गया है। राम का शत्रु होने के कारण वह अपनी ही आत्मा का हनन करने वाला आत्मशत्रु भी था। श्रुति के अनुसार ऐसे व्यक्ति कोब्रह्मसायुज्यमुक्ति नहीं मिलती है।


Friday, 21 June 2013

रावण सहिंता के ये उपाय चमका देंगे आपकी किस्मत को ..........................

बहुत कम लोग जानते हैं।  रावण सभी शास्त्रों का जानकार और श्रेष्ठ विद्वान था।
रावण ने भी ज्योतिष और तंत्र शास्त्र की रचना की है। दशानन ने ऐसे कई उपाय बताए हैं जिनसे किसी भी व्यक्ति की किस्मत रातोंरात बदल सकती है।

यहां जानिए रावण संहिता के अनुसार कुछ ऐसे तांत्रिक उपाय जिनसे किसी भी व्यक्ति की किस्मत चमक सकती है...
1. धन प्राप्ति का उपाय: किसी भी शुभ मुहूर्त में या किसी शुभ दिन में सुबह जल्दी उठें। इसके बाद नित्यकर्मों से निवृत्त होकर किसी पवित्र नदी या जलाशय के किनारे जाएं। किसी शांत एवं एकांत स्थान पर वट वृक्ष के नीचे चमड़े का आसन बिछाएं। आसन पर बैठकर धन प्राप्ति मंत्र का जप करें।
धन प्राप्ति का मंत्र: ऊँ ह्रीं श्रीं क्लीं नम: ध्व: ध्व: स्वाहा।
इस मंत्र का जप आपको 21 दिनों तक करना चाहिए। मंत्र जप के लिए रुद्राक्ष की माला का उपयोग करें। 21 दिनों में अधिक से अधिक संख्या में मंत्र जप करें।
जैसे ही यह मंत्र सिद्ध हो जाएगा आपको अचानक धन  प्राप्ति अवश्य कराएगा।

2.यदि किसी व्यक्ति को धन प्राप्त करने में बार-बार रुकावटें आ रही हों तो उसे यह उपाय करना चाहिए।
यह उपाय 40 दिनों तक किया जाना चाहिए। इसे अपने घर पर ही किया जा सकता है। उपाय के अनुसार धन प्राप्ति मंत्र का जप करना है। प्रतिदिन 108 बार।
मंत्र: ऊँ सरस्वती ईश्वरी भगवती माता क्रां क्लीं, श्रीं श्रीं मम धनं देहि फट् स्वाहा।
इस मंत्र का जप नियमित रूप से करने पर कुछ ही दिनों महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त हो जाएगी और आपके धन में आ रही रुकावटें दूर होने लगेंगी।

3. यदि आप दसों दिशाओं से यानी चारों तरफ से पैसा प्राप्त करना चाहते हैं तो यह उपाय करें। यह उपाय दीपावली के दिन किया जाना चाहिए।
दीपावली की रात में विधि-विधान से महालक्ष्मी का पूजन करें। पूजन के सो जाएं और सुबह जल्दी उठें। नींद से जागने के बाद पलंग से उतरे नहीं बल्कि यहां दिए गए मंत्र का जप 108 बार करें।
मंत्र: ऊँ नमो भगवती पद्म पदमावी ऊँ ह्रीं ऊँ ऊँ पूर्वाय दक्षिणाय उत्तराय आष पूरय सर्वजन वश्य कुरु कुरु स्वाहा।
शय्या पर मंत्र जप करने के बाद दसों दिशाओं में दस-दस बार फूंक मारें। इस उपाय से साधक को चारों तरफ से पैसा प्राप्त होता है

4.सफेद आंकड़े को छाया में सुखा लें। इसके बाद कपिला गाय यानी सफेद गाय के दूध में मिलाकर इसे पीस लें और इसका तिलक लगाएं। ऐसा करने पर व्यक्ति का समाज में वर्चस्व हो जाता है।

5.यदि आपको ऐसा लगता है कि किसी स्थान पर धन गढ़ा हुआ है और आप वह धन प्राप्त करना चाहते हैं तो यह उपाय करें।
गड़ा धन प्राप्त करने के लिए यहां दिए गए मंत्र का जप दस हजार बार करना होगा।
मंत्र: ऊँ नमो विघ्नविनाशाय निधि दर्शन कुरु कुरु स्वाहा।
गड़े हुए धन के दर्शन करने के लिए विधि इस प्रकार है। किसी शुभ दिवस में यहां दिए गए मंत्र का जप हजारों की संख्या करें। मंत्र सिद्धि हो जाने के बाद जिस स्थान पर धन गड़ा हुआ है वहां धतुरे के बीज, हलाहल, सफेद घुघुंची, गंधक, मैनसिल, उल्लू की विष्ठा, शिरीष वृक्ष का पंचांग बराबर मात्रा में लें और सरसों के तेल में पका लें। इसके बाद इस सामग्री से गड़े धन की शंका वाले स्थान पर धूप-दीप ध्यान करें। यहां दिए गए मंत्र का जप हजारों की संख्या में करें।
ऐसा करने पर उस स्थान से सभी प्रकार की नकारात्मक शक्तियों का साया हट जाएगा। भूत-प्रेत का भय समाप्त हो जाएगा। साधक को भूमि में गड़ा हुआ धन दिखाई देने लगेगा।
ध्यान रखें तांत्रिक उपाय करते समय किसी विशेषज्ञ ज्योतिषी का परामर्श अवश्य लें।

6.शास्त्रों के अनुसार दूर्वा घास चमत्कारी होती है। इसका प्रयोग कई प्रकार के उपायों में भी किया जाता है। यदि कोई व्यक्ति सफेद दूर्वा को कपिला गाय यानी सफेद गाय के दूध के साथ पीस लें और इसका तिलक लगाएं तो वह किसी भी काम में असफल नहीं होता है।

7.महालक्ष्मी की कृपा तुरंत प्राप्त करने के लिए यह तांत्रिक उपाय करें।
किसी शुभ मुहूर्त जैसे दीपावली, अक्षय तृतीया, होली आदि की रात यह उपाय किया जाना चाहिए। दीपावली की रात में यह उपाय श्रेष्ठ फल देता है। इस उपाय के अनुसार आपको दीपावली की रात कुमकुम या अष्टगंध से थाली पर यहां दिया गया मंत्र लिखें।
मंत्र: ऊँ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्मी, महासरस्वती ममगृहे आगच्छ-आगच्छ ह्रीं नम:।
इस मंत्र का जप भी करना चाहिए। किसी साफ एवं स्वच्छ आसन पर बैठकर रुद्राक्ष की माला या कमल गट्टे की माला के साथ मंत्र जप करें। मंत्र जप की संख्या कम से कम 108 होनी चाहिए। अधिक से अधिक इस मंत्र की आपकी श्रद्धानुसार बढ़ा सकते हैं।
इस उपाय से आपके घर में महालक्ष्मी की कृपा बरसने लगेगी।

8.अपामार्ग के बीज को बकरी के दूध में मिलाकर पीस लें, लेप बना लें। इस लेप को लगाने से व्यक्ति का समाज में आकर्षण काफी बढ़ जाता है। सभी लोग इनके कहे को मानते हैं।

9.यदि आप देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर की कृपा से अकूत धन संपत्ति चाहते हैं तो यह उपाय करें।
उपाय के अनुसार आपको यहां दिए जा रहे मंत्र का जप तीन माह तक करना है। प्रतिदिन मंत्र का जप केवल 108 बार करें।
मंत्र: ऊँ यक्षाय कुबेराय वैश्रवाणाय, धन धन्याधिपतये धन धान्य समृद्धि मे देहि दापय स्वाहा।
मंत्र जप करते समय अपने पास धनलक्ष्मी कौड़ी रखें। जब तीन माह हो जाएं तो यह कौड़ी अपनी तिजोरी में या जहां आप पैसा रखते हैं वहां रखें। इस उपाय से जीवनभर आपको पैसों की कमी नहीं होगी।

10.यदि आप घर या समाज या ऑफिस में लोगों को आकर्षित करना चाहते हैं तो बिल्वपत्र तथा बिजौरा नींबू लेकर उसे बकरी के दूध में मिलाकर पीस लें। इसके बाद इससे तिलक लगाएं। ऐसा करने पर व्यक्ति का आकर्षण बढ़ता है।

ध्यान रखें तांत्रिक उपाय करते समय किसी विशेषज्ञ ज्योतिषी का परामर्श अवश्य लें।
 

Monday, 17 June 2013

हस्तरेखा भी बताती है आपका नसीब

गर्भावस्था के दौरान ही शिशु के हाथ में लकीरो का जाल बुन जाता है, जो कि जन्म से लेकर मृत्यु तक रेखाओ के रुप में विद्यमान रहता है। इसे हस्त रेखा के रुप में जाना जाता है। सामान्यतया 16 वर्ष तक की आयु के बच्चो की हाथों की रेखाओ में परिवर्तन होता रहता है।
सोलह वर्ष की आयु होने पर मुख्य रेखाएँ (जीवन रेखा, भाग्य रेखा इत्यादि) स्थिर हो जाती है तथा कर्मो के अनुसार अन्य छोटे-बडे परिवर्तन होते रहते हैं। तथा ये परिवर्तन जीवन के अंतिम क्षण तक होते रहते हैं
चूंकि हस्त रेखा (Samudrik Shastra) विज्ञान कर्मो के आधार पर टिका है, इसलिए मनुष्य जैसे कर्म करता है वैसा ही परिवर्तन उसके हाथ की रेखाओ में हो जाता है हाथ का विश्लेषण करते समय सबसे पहले हम हाथ की बनावट को देखते हैं तत्पश्चात यह देखा जाता है कि हाथ मुलायम है या सख्त।आम तौर पर पुरुषो का दायाँ हाथ तथा स्त्रियों का बायाँ हाथ देखा जाता है।यदि कोइ पुरुष बायें हाथ से काम करता है तो उसका बायाँ हाथ देखा जाता है। हाथ में जितनी कम रेखाऎं होती हैं, भाग्य की दृष्टि से हाथ उतना ही सुन्दर माना जाता है
हाथ में मुख्यतः चार रेखाओ का उभार स्पष्ट रुप से रहता है
जीवन रेखा हृदय रेखा के ऊपरी भाग से शुरु होकर आमतौर पर मणिबन्ध पर जाकर समाप्त हो जाती है  यह रेखा भाग्य रेखा के समानान्तर चलती है, परन्तु कुछ व्यक्तियो की हथेली में जीवन रेखा हृदय रेखा में से निकलकर भाग्य रेखा में किसी भी बिन्दु पर मिल जाती है।जीवन रेखा तभी उत्तम मानी जाती है यदि उसे कोइ अन्य रेखा न काट रही हो तथा वह लम्बी हो इसका अर्थ है कि व्यक्ति की आयु लम्बी होगी तथा अधिकतर जीवन सुखमय बीतेगा। रेखा छोटी तथा कटी होने पर आयु कम एंव जीवन संघर्षमय होगा

भाग्य रेखा:(Fate Line)
हृदय रेखा के मध्य से शुरु होकर मणिबन्ध तक जाने वाली सीधी रेखा को भाग्य रेखा कहते हैं (Straight Line start from middle of heart and end on Manibandh line called fate line) ।स्पष्ट रुप से दिखाई देने वाली रेखा उत्तम भाग्य का घौतक है।यदि भाग्य रेखा को कोइ अन्य रेखा न काटती हो तो भाग्य में किसी प्रकार की रुकावट नही आती।परन्तु यदि जिस बिन्दु पर रेखा भाग्य को काटती है तो उसी वर्ष व्यक्ति को भाग्य की हानि होती है।कुछ लोगो के हाथ में जीवन रेखा एंव भाग्य रेखा में से एक ही रेखा होती है।इस स्थिति में वह व्यक्ति आसाधारण होता है, या तो एकदम भाग्यहीन या फिर उच्चस्तर का भाग्यशाली होता है (If there is no fortune line on your palm it means you are not a middle class)। ऎसा व्यक्ति मध्यम स्तर का जीवन कभी नहीं जीता है।
हृदय रेखा: (Heart Line)
हथेली के मध्य में एक भाग से लेकर दूसरे भाग तक लेटी हुई रेखा को हृदय रेखा कहते हैं (Vertical line starts from middle of palm and end on heart line called heart line)। यदि हृदय रेखा एकदम सीधी या थोडा सा घुमाव लेकर जाती है तो वह व्यक्ति को निष्कपट बनाती है। यदि हृदय रेखा लहराती हुई चलती है तो वह व्यक्ति हृदय से पीडित रहता है।यदि रेखा टूटी हुई हो या उस पर कोइ निशान हो तो व्यक्ति को हृदयाघात हो सकता है(There is Chance of heart attack if heart line is break)।
मस्तिष्क  रेखा:(Brain Line)
हथेली के एक छोर से दूसरे छोर तक उंगलियो के पर्वतो तथा हृदय रेखा के समानान्तर जाने वाली रेखा को मस्तिष्क रेखा  कहते हैं (Parallel line to heart line is called mind line)। यह आवश्यक नहीं कि मस्तिष्क रेखा एक छोर से दूसरे छोर तक (हथेली) जायें, यह बीच में ही किसी भी पर्वत (Planetary Mounts) की ओर मुड सकती है। यदि हृदय रेखा और मस्तिष्क रेखा आपस में न मिलें तो उत्तम रहता है (Brain line is good if mind line or heart line are not together)। स्पष्ट एंव बाधा रहित रेखा उत्तम मानी जाती है। कई बार मस्तिष्क रेखा एक छोर पर दो भागों में विभाजित हो जाती है। ऎसी रेखा वाला व्यक्ति स्थिर स्वभाव का नहीं होता है, सदा भ्रमित रहता है।

Tuesday, 11 June 2013

नवग्रह

प्राचीन काल से मानव भविष्य को जानने की इच्छा रखता हॆ ऒर भविष्य सुधारने को प्रयत्नशील शील रहता हॆ:समभ्वत: उसके मन में यह विचार रहता हो कि पूर्व ज्ञान होने से समस्या का बेहतर निदान हो सकता हॆ, आकाशीय पिन्ड मानव जीवन एवं उसके दिन प्रतिदिन के व्यवहार पप कितना प्रभाव डालते हॆं,  विवादास्पद विषय हॆ;
परम्परागत रूप मे ज्योतिषीय आधार में नवग्रह माने गये हॆं, सात दिनों पर आधारित सात ग्रह सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध वॄह्स्पति,शुक्र, शनि ऒर दो छाया
ग्रह राहु व केतु, प्रत्येक ग्रह का एक एक प्रतिनिधि पॊधा या वॄक्ष होता हॆ.इन पॊधों के संरक्षण व संवर्धन से मानवता का ऒर जीव का कल्याण होता हॆ,ऎसा प्राचीन ग्रंथों में कहा गया हॆ. आइये बारी बारी से इन प्रतिनिधि पॊधों के विषय में जाने;
                     
 सूर्य: का प्रतिनिधि पॊधा हॆ मदार या आक इसे क्षीर-पर्ण,व अर्क भी कहते हें यह पूरे भारत में पाया जाता हॆ यह जंगली रूप बिना किसी विशेष देखभाल के उगता हॆ.यह पॊधा कागज़ बनाने के काम भी आता हॆ,इसका रस सूखने पर,गाढ़ा होकर गटापार्चा जॆसा हो जाता हॆ. आत्म हत्या व गर्भपातमें इसका प्रयोग प्राय; होता हॆ.
ऒषधीय गुण;मदार की जड, प्राय: हाथी-पांव रोग,कोढ, पुराने एक्जिमा के अतिरिक्त दस्तों  व पेचिश में भी प्रयोग में लाते हॆं.मिस्र मेंअरब घाटी  इसके फ़लों का आकर छोटे आम जॆसा होता हॆ.
  
संस्कॄत में इसे क्षीर पर्ण या अर्क कहते हॆं, मदार की विशेषता यह भी हॆ कि मदार  ग्रीष्म को विकट परिस्थितियों को बखूबी सह लेता हॆ, भीषण गर्मियों मे जब ऒर पॊधे मॄत प्राय हो जाते हॆं मदार में बहार रहती हॆ.वॆद्य मनोरमा में मदार की तुलना सूर्य से करते हुए लिखा हॆ  कि तीक्ष्णता ऒर  उज्ज्वलता में सूर्य भगवान के समान हे अर्क! मॆं आपका अभि नन्दन करता हूं, जहां आप यानि
मदार नहीं होंगे वह्म ,उस प्रदेश में में नहीं रहूंगा.  ;तो यह हॆ रोमयुक्त मांसल पत्तियों ऒर बॆजनी फ़ूल वाले मदार क्षीर पर्ण की महिमा. होमियोपॆथी में आक का प्रयोग कोढ से  सुन्न पडे अंगों में नई चेतना के संचार हेतु  लाते हॆं.










 चंद्र: का प्रतिनिधि पॊधा हॆ पलाश,जिसे सामान्य भाषा में किंशुक, टॆसू या ढाक भी कहते हॆं.,.
एक कहावत प्रसिद्ध हॆ,-ढाक के तीन पात,,पलाश का पॊध बडा महत्वपूर्ण हॆ यह मध्यम ऊंचाई ,लगभग १५ मीटर का वॄक्ष हॆ.इसमें वसन्त ॠतु में,होली के आ आसपास सुन्दर गहरे लाल या नारंगी रंग के फूल आते हॆं.इन फ़ूलों से एक रंग भी तॆयार होता हॆ. एक कथा के अनुसार शिव पार्वती के एकान्त में  बाधा पहुंचाने पर, पार्वती ने अग्नि देव को श्राप दे दिया जिसके फ़लस्वरूप यह पॊधा बना,अत: यह पलाश अग्नि का ही रूप हॆ. टेसऊ के बीज कामोत्तेजक होते हॆं. आयुर्वेद में इसका बहुत महत्व हॆ. ढाक गरीब की क्रोकरी हॆ,पत्तल व दॊने इसी से बनते हॆं. दक्षिण भारत में जो काम केले के पत्तों से लिया जाता हॆ, उत्तर में वही काम ढाक के पत्ते करते हॆं. इसके तने से एक गॊंद मिलता हॆ जिसे कमर-कस कहते हॆं. यह स्त्री रोगों में बहुत काम आता हॆ. नोबुल पुरस्कार विजेता,प्रसिद्ध भारतीय कवि श्री रवीन्द्र नाथ टॆगोर को पलाश के फूल बहुत पसन्द करते थे ऒर उन्होंने शांतिनिकेतन में अपनी कुटिया के चारों ओर पलाश के वॄक्ष ही लगवाए,ऒर कुटिया क नाम रखा-पलाशी;उनकी साहित्व साधना यहीं से होती थी.








ऒषधीय गुण धर्म;ढाक की छाल व पत्तियों में काइनोटॆनिक एसिड  तथा गॆलिक एसिड होता हॆ . पलाश के फूल स्तम्भक, तॄष्णा शामक कोढ दूर करने वाला,कह च पित्त नाशक,भूख बढाने वाले होते हॆ. पत्ते यकॄत उत्तेजक होते हॆं. इसका गोंद भी स्तम्भक, अम्लानाशक,खासी निवारक व संग्रहणी को दूर करता हॆ. पलाश के पत्तों का काढा पीने से अफ़ारा व पेट दर्द दूर होता हॆ.,पलाश के बीजों के चूर्ण क एक एक चम्मच दो बार खाने से पेट के सब कीडे मर कर बाहर आ जाते हॆं. इसकी जड के रस के सेवन से अनॆच्छिक वीर्यस्राव रुकता हॆ,ऒर काम शक्ति प्रबल होही हॆ ज्डों के रस में गेहूं के दाणे तीन दिन भिगो कर खाने से यॊन रोग ठीक हो जाते हॆं व काम शक्ति में वॄद्धि होती हॆ.

.मंगल: का प्रतिनिधि हॆ खॆर या कत्था,यह मध्यम ऊंचाई वाला कांटे दार वॄक्ष हॆ इसके कांटे बिल्ली के पंजों की तरह होते हॆं, इसी से इसे कटेचू नाम दिया गया हॆ. इसके पत्ते व बीज प्रोतीन युक्त होते हॆं इसका स्वरस वात सम्बन्धी रोगों को व सूजन को ठीक करता हॆ. दस्त ऒर पेचिश को भी ठीक करता हॆ.इसके पत्ते व टहनियां बकरी एवं ऊंट बडे चाव से खाते हॆं उनके लिए यह विशेष उपयोगी हॆ.
इसकी लकडी भी बहुत उपयोगी होती हॆ.इमारती लकडी की तरह ही अन्य उपकरणो एवं हलों को बनाने मे इसका इस्तेमाल होता हॆ,लकडी का कोयला भी अति मूल्यवान होता हॆ विशेषत: सोने,चांदी पर काम करने वालों के लिए. व लोहारों के लिए. हल, चाकू छुरी,तलवार की मूठ व हत्थे,हुक्के की नली व गन्ने की पिराई  मे भी इसका उपयोग होता हॆ इस पर पॊलिश भी आसानी से व अच्छी हो
जाती हॆक तथा कफ़,पित्त संशोधक हॆ.यह सूजन को हटाने वाला,कीडॊं को मारने वाला,रक्त शोधक,रक्त वर्धक,पसीना लाने वाला,पाचक हॆ. त्वचा रोगोंमें सर्प, बिच्छू ततॆयां,भ्रमरी आदि के दंश पर इसके पत्तों क लेप बहुत गुणकारी होता हॆ/
आधा सीसी; इसके बीजों का चूर्ण सूघने मात्र सेमस्तक के अन्दर जमा हुवा कफ़ पतला होकर नाक के रास्ते बाहर निकल आता हॆ.
दांतों के रोगों में,इसकी ताजी जड की दातुन करने से दांत मोती की तरह चमकने लगते हॆं,दांतों का दर्द,मसूढो की कमजोरी मुंह से दुर्गन्ध आना,दांत का हिलना भी ठीक हो जाता हॆ.





.बुध या मरकरी: इसका प्रतिनिधि पॊधा हॆ;अपामार्ग,  लटजीरा या,चिरचिटा; लॆटिन में इसे कहते हॆं अपामार्ग का अर्थ हॆ,जो दोषों को संशोधित करे असाध्य रोगों का भी अंत करे.अपामार्ग एक ऎसा दिव्य पॊधा हॆ जो प्रसव काल से लेकर जीवन के अंत समय तक के रोगों को दूर करने की क्षमता रखता हॆ.

यह पॊधा भारत में सभी प्रांतों में जंगलीरूप में पाया जाता हॆ. वर्षा ऋतु में यह विशेषकर पाया जाता हॆ.अपामार्ग का पोधा १ से ३ फ़ुट ऊंचा होता हॆ.शाखाएं पतली पर गांठों पर मोटा होता हॆ. पत्ते अडाकार ऒर र्रोम युक्त होते हॆं पुष्प मन्जरी पत्तों के बीच से निकलती हॆ. अपामार्ग में पॊटेशियम की मात्रा बहुत अधिक होती हॆ.
श्वास रोग, अपामार्ग की जड में बलगम,खांसी ऒर दमा को दूर करने के चमत्कारी गुण हॆं,इस पॊधे की ८-१० सूखे पत्तों को हुक्के में रख कर पीने से सांस लेने में लाभ होता हॆ.बच्चों की काली खांसी इसके बीजों की राख को शहद के साथ चटाने से जल्दी ही ठीक हो जाती हॆ. सुख प्रसव;प्रसव पीडा प्रारम्भ होने से पहले अपामार्ग की जड को एक धागे से कमर में बांधने से आसानी से प्रसव होता हॆ.पर प्रसव के तुरन्त बाद उसे हटा लेना चाहिये. ८० वर्ष के वॄद्ध व्यक्ति भी अपामार्ग की जड से दातुन करें तो उनके दांत भी स्वस्थ देखे गये हॆं वॄद्धावस्था मे दांतों की मजबूती का यही रहस्य हॆ.


















५.वॄहस्पति या गुरु जुपीटर: इसका प्रतिनिधि पॊधा हॆ पीपल, या अश्वत्थ. पीपल का वॄक्ष भारत में पवित्र माना जाता हॆ,एसा विश्वास हॆ कि इसी वॄक्ष के नीचॆ,गया में,भगवान बुद्ध ने कठिन तपस्या करके ज्ञान प्राप्त किया था.यह आज से बहुत पहले  २८८बी.सी.में लगाया गया था, इस वॄक्ष को प्रसन्नता, स्मॄद्धि, दीर्ह्ग जीवन ऒर सॊभाग्य का प्रतीक माना गया हॆ. ऒषधीय गुण धर्म; .इस वॄक्ष की जड, छाल, पत्ते, फूल सभी उपयोगी होते हॆं.छाल प्रदर में उपयोगी,फल दस्तावर, ऒर बीज ठंडक देने वाले होते हॆं. पेड की छाल,बालों के कीदों को नष्ट करती हॆ.पत्तियां व नई कोंपलें पेट साफ़ करती हॆं.
इसके पेड घने व छायादार होतॆ हॆं, मन्द गति में भी हवा चले तो भी इसके पत्ते हिलने लगते हॆं,अत: इसके पत्ते अस्थिर चित्त का प्रतीक कहे गये हॆं उपमा दी जाती हॆ-पीपर पात सरिस मन डॊलाf अत: यह अस्थिर मन का प्रतीक भी हॆ.पीपल की ताजी टहनी प्रतिदिन दातुन करने से दांत मजबूत होते हॆं,मसूढों की सूजन व मुख कीदुर्ग>ध समाप्त हो जाती हॆ.पीपल के पत्ते गुड के साथ चबा कर खाने से पेट क दर्द खतम हो जाता हॆ. पीपल के पत्ते मिश्री के साथ घोट कर पीने से पीलिया रोग भी ठीक हो जाता हॆ.                                                                   



.शुक्र ,वीनस: का प्रतिनिधि वॄक्ष हॆ-गूलर,संस्कॄत मॆं इसे उदम्बर   या उडम्बर कहते हॆं ,यह भी एकघना,छायादार ,पेड हॆ एक विशेष बात इसके बारे में यह हॆ कि  प्राचीन ग्रथों में भी इसका वर्णन मिलता हॆ-खास कर अथर्व वेद में.जो लगभग २५०० साल पुराना हॆकहा जाता हॆ कि प्रसिध राजा हरिश्चन्द्र जो इक्षावाकु वंश के थे,उनका मुकुट उदम्बर वॄक्ष की टहनी से बना था जो सोने से जडी थी.ऒर उनका सिंहासन उदम्बर की ल्कडी से ही बना था.

अथर्ववेद के अनुसार गूलर का वॄक्ष पुष्टि देने में सर्व श्रेष्ठ कहागया हॆ. इसके फल का दूध घी के साथ सेवन करने से  बूढा भी जवान हो जाता हॆ,ऒर कहा गया हॆ कि इंद्र देव की प्रेरणा से ही अपनी तेजस्विता के साथ यह ऒदुम्बर ,प्रजा व वॆभव के साथ हमे उपलब्ध हुआ  हॆ..इसका तना लम्बा,मोटा तथा टेढा होता हॆ. इसमें फल सारे साल लगते रहते हॆं अत; इसे बारह मासी भी कहा जाता हॆ. इसमे फल गोलाकार १-२ इंच व्यास के,कच्ची अवस्था में हरे ऒर पकने पर हल्के लाल हो जाते हॆं.
इनमें टॆनिन,मोम व रबड तथा राख मॆं सिलिका ऒर फस्फोरिक एसिड पाये जाते हॆं.
ऒषधीय गुण धर्म: छाल व कच्चे फल स्तम्भन,प्रमेह नाशक ऒर दाह नाशक हॆ.पके फल श्लेश्म दूर करने वाले,मन को प्रसन्न करने वाले व दाह नाशक हॆ.५ग्रम गूलर के पत्तों के रस में शहद मिलाकर पिलाने से रक्तपित्त मिटता हॆ. इससे रक्तातिसार में भी तुरन्त लाभ होता हॆ. इसके दूध की ८-१० बूंदें दो बताशों मे भर कर रोज खिलाने से मूत्र रोग मिटते  हॆं.
                                                   


.शनि: इसका प्रतिनिधि पॊधा हॆ-शमी,खिजरी या छ्योंकर,इसका इतिहास भी प्राचीन हॆ,प्रसिद्ध महाकाव्य महाभारत  आठवीं पुस्तक में fकर्ण पर्वf में अध्याय ३०,श्लोक २४ में शमी,पीलू व करीर के वृक्षों का वर्णन हॆ.."विराट पर्वमें पांड्वों ने विराट की राजधानी मेम जाने से पूर्व अपने अस्त्रदि शमी वॄक्ष में ही छिपा के रखे थे. तमिल नाडु में इसे पवित्र पेड माना जाता हॆ ऒर भगवान शिव व श्री मुरुगन के मंदिरों के स्थल भी एसी वॄक्ष के नीचे होते हॆं.
शमी का वॄक्ष बडा उपयोगी होता हॆ.विशेष रूप से मरुस्थलीय क्षेत्र में क्यॊंकि वहां के वातावरण में यही पेड खूब फलता फूलता हॆ,रेत के टीलों एवं मिट्टी को इसकी जडॆ.बांध कर रखती हॆं इसकी पत्तियों को सभी मवेशी,भेढें, बकरियां, ऊंट,गधे, आदि के अतिरिक्त पश्चिमी राजस्थान में काला हिरन ऒर चिंकारा भी इसकी फलियों व पत्तियों पर निर्भर रहते हॆं.
ऒषधीय उपयोग व गुणधर्म;.
शमी के फूलों को पीस कर चीनी मिला कर खाने से गर्भावस्था के दॊरान गर्भपात नहीं होता.इसकी छाल को पानी में भिगो कर जो द्रव निकलता हॆ उसमें सूजन को दूर करने वाले गुण पाए जाते हशमी पॊधे से मई, जून के महीने मे  एक गोंद प्राप्त होता हॆ. पेड की छाल कडवी,व तेज होती हॆ. कीडे मारने वाली,कोढ को ठीक करने वाली,पेचिश,अस्थमा,श्वास रोगों को मिटाने वाली,ल्यूकोडर्मा,मांसपेशियों के विकारों को ठीक करती हॆ. इसकी पत्तियों का धुआं नेत्रों को नुकसान नहीं पहुंचाता बल्कि नेत्र रोगों को ठीक करता हॆ.वॄक्ष की छाल वात रोग,रोठिया,खांसी,सामान्य जुकाम,अस्थमा के साथ  बिच्छू के काटे का भी इलाज होता हॆ, पंजाब में इससे सांप काटने का भी इलाज होता हॆ.


                                               
                         
                                                                         

.राहु: इस छाया ग्रह का प्रतिनिधि हॆ दूब, राम घास,दूर्बा या,काली घास;संस्कॄत में इसे ध्रुव या हरितली  कहते हॆं. नंगे पॆर चलना घास पर सेहत के लिए बहुत फ़ायदे मन्द होता हॆ.इससे नेत्र ज्योति बढ्ती हॆ ऒर शरीर की कई व्याधियां दूर हो जाती हॆं.

दूब घास विशेषता यह हॆ कि यह सूर्य के प्रकाश में हरा भरा रहता हॆ पर छाया में उतना नहीं.इसके विकास के लिये २४-३७.सी का तापमान सबसे उपयुक्त रहता हॆ.यह ४-१५ से.मी. तक लम्बा होता हॆ.इसकी जड बडी गहरी होती हॆ. ऒर सतह के नीचे २ मीटर तक फॆल सकती हॆ. गरम वातावरण मएं यह पूरे विश्व में पाया जाता हॆ.दूब घास ऒर घासों की तुलना में अधिक तेजी से फ़ेलता हॆ क्योंकि इसमे प्रतिकूल मॊसम को सहने की क्षमता हॆ.यह आक्रामक भी हॆ.इसी कारणसे इसे डेविल या शॆतान घास भी कहते हॆं. इसकी  पत्तियां
भूरे हरे रंग की होती हं जिसमें से गुच्छॊं से ३-७ मन्जरी  निकलती हॆं.
























ऒषधीय  गुण; दूब वाइरस ऒर बॆक्टीरिया प्रतिरोधी होता हॆ.इसे पानी में उबाल कर पानी के कुल्ले करने से मुंह के छाले दूर हो जाते हॆं.दूब को चूने मे मिला कर पीस कर माथे पर लेप करने से सिर दर्द ठीकहो जाता हॆ.दूब का काढा वेदना नाशक हॆ मूत्र की जलन को शान्त करता हॆ,मूत्र नली के संक्रमण को दूर करने के अतिरिक्त यह प्रोस्ट्रेट ग्रन्थि, उपदंश व पेचिश के इलाज में भी   काम आता हॆ

मधुमेह में व ग्लूकोज की कमी को दूर करने में भी यह उपयोगी सिद्ध हुआ हॆ.प्रयोग शाला के चूहों पर इलाहाबाद विश्व विद्यालय  के शोध कर्ताओ ने अपने शोध मे यह पाया हॆ. इस बात की प्रबल सम्भावना हॆ कि भविष्य में मधु मेह क इलाज दूब घास से हो. आंख दुखने पर इसके पत्तों को पीस कर पलकों पर बांधने से आराम मिलता हॆ. इसकी जड मस्सों से रक्त प्रवाह रोकती हे.इसके पत्तों क रस ताजे जख्मों ऒर घावों पर लगाते हॆ.पेचिश ऒर दस्त भी इसी से ठीक होते हॆं.





.केतु: इस छाया ग्रह का प्रतिनिधि हॆ एक घास जेसे  कहत्ते हॆं.- कुश,संस्कॄत में दर्भ, अथर्व वेद में इस  दर्भ महिमा गायी गयी हॆ अथर्व वेद संहिता में लिखा हॆ कि जल वर्षक मेघ विद्युत के साथ गर्जना करते हें उससे स्वर्ण मय जल बिंदु ऒर कुश की उत्पत्ति हुई, ऒर पुरुषों को दीर्घ जीवन व तेजस्विता प्रदान करने के लिए दर्भ  उनके शरीर से बांधा जाता हॆक्योंकि दर्भ शत्रु संहारक ऒर विद्वेशी शत्रुओं को संतप्त करने वाली हॆ. दर्भ पूरे भारत में गर्म व सुखे इलाकों में पाई जाती हॆ.






इसका तना मूत्र वर्धक,उत्तेजक तथा पेचिश में उपयोगी होता हॆ. नवीन तम खोजों से यह ज्ञात हुआ हॆ कि दर्भ के तने में पांच एल्केलायड पाए जाते हॆं जो किसी भी प्रकार के खून को बहने से रोकते की क्षमता रखते हॆं.


इस प्रकार हमने देखा कि सारे ग्रह ऒर उनके प्रतिनिधि पॊधे मानव जाति की रक्षा हेतु प्रतिबद्ध हॆं. दूरस्थ ग्रह मनुष्य की कितनी रक्षा कर सकते हॆं यह तो हमें मालूम नहीं  पर ये प्रतिनिधि पॊधे अपने गुणॊ से हमें जरूर कई बीमारियों से बचा सकते हॆं

क्या कहते है वास्तु और उसके बनाये गए नियम

सर्व प्रथम वास्तु संबंधी नियमों की दिशाओं का ज्ञान, उनके अधिपति, ग्रह तथा दिशाओं से संबंधित तत्वों का ज्ञान होना अति आवश्यक है। इसे और अच्छी तरह से इस प्रकार समझा जा सकता है।
उत्तर-पूर्व को ईशान कोण, उत्तर-पश्चिम को वायव्य कोण, दक्षिण-पूर्व को आग्नेय कोण एवं दक्षिण-पश्चिम को नैत्य कोण कहते हैं।
इन दिशाओं से संबंधित तत्व इस प्रकार हैं- उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) जल तत्व उत्तर-पश्चिम (वायव्य कोण) वायु तत्व दक्षिण-पूर्व (आग्नेय कोण) अग्नि तत्व दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य कोण) पृथ्वी तत्व ब्रह्म स्थान (मध्य स्थान) आकाश तत्व जल, वायु, अग्नि, पृथ्वी और आकाश, पंच महाभूत तत्व कहे जाते हैं। जिनसे मिलकर हमारा शरीर बना है।
इन पंचमहाभूतों से संबंधित ग्रह निम्नलिखित हैं- पृथ्वी - मंगल जल - शुक्र अग्नि - सूर्य वायु - शनि आकाश - शनि साथ ही चार अन्य ग्रहों (चंद्रमा, बुध, राहु और केतु) का संबंध, क्रमशः मन, बुध, अहंकार एवं मोक्ष से है।

वास्तु के इस प्रारंभिक ज्ञान के बाद 'अष्टदिशा वास्तु' का ज्ञान होना भी जन साधारण के लिए अतिआवश्यक है- इस प्रकार दिशाओं के अनुरूप गृह निर्माण करवाने से घर में वास्तु दोष होने का कोई कारण नजर नहीं आता, फिर भी शहरों में स्थानाभाव के कारण छोटे-छोटे भूखंडों पर घर बनाने पड़ते हैं साथ ही शहरों में अधिक संखया में लोग फ्लैट्स में ही रहते हैं जो पहले से ही निर्मित होते हैं अतः घर पूर्णतया वास्तु सम्मत हो, ऐसा संभव नहीं हो पाता। चाहकर भी हम उन वास्तु दोषों को दूर नहीं कर पाते हैं और हमें उसी प्रकार उन वास्तु दोषों को स्वीकार करते हुए अपने घर में रहना पड़ता है। ऐसी परिस्थितियों में कुछ उपयोगी वास्तु टिप्स को अपनाकर गृह दोषों को काफी सीमा तक कम किया जा सकता है।
यह महत्वपूर्ण जानकारियां निम्नलिखित हैं-
सर्वप्रथम घर के मुखय द्वार पर दृष्टि डालते हैं घर का मुखय द्वार सदैव पूर्व या उत्तर में ही होना चाहिए किंतु यदि ऐसा न हो पा रहा हो तो घर के मुखय द्वार पर 'स्वास्तिक' की प्राण प्रतिष्ठा करवाकर लगाने से नकारात्मक ऊर्जा का नाश और सकारात्मक ऊर्जा का विकास होने लगता है।
घर की स्थिति अनुकूल होने लगती है।
घर के मुखय द्वार पर तुलसी का पौधा रखें। सुबह उसमें जल अर्पित करें तथा शाम को दीपक जलाएं। पूर्व या उत्तर दिशा में तुलसी का पौधा लगाने से घर के सदस्यों में आत्मविश्वास बढ़ता है।
घर की छत पर तुलसी का पौधा रखने से घर पर बिजली गिरने का भय नहीं रहता। घर में किसी प्रकार के वास्तु दोष से बचने के लिए घर में पांच तुलसी के पौधे लगाएं तथा उनकी नियमित सेवा करें।
ध्यान रहे कि घर में खिड़की दरवाजों की संखया सम हो जैसे (2, 4, 6, 8, 10) तथा दरवाजे खिड़कियां अंदर की तरफ ही खुलें।
द्वार खुलते-बंद होते समय किसी भी प्रकार की कर्कश ध्वनि नहीं आनी चाहिए। ये अशुभ सूचक होता है।
यदि किसी भिक्षुक को भिक्षा देनी हो तो घर से बाहर आकर ही दें, अन्यथा अनहोनी होने की संभावना रहती है।
कलह से बचने के लिए घर में किसी देवी-देवता की एक से अधिक मूर्ति या तस्वीर न रखें। किसी भी देवता की दो तस्वीरें इस प्रकार न लगाएं कि उनका मुंह आमने-सामने हो। देवी-देवताओं के चित्र कभी भी नैत्य कोण में नहीं लगाने चाहिए अन्यथा कोर्ट-कचहरी के मामलों में उलझने की पूरी संभावना रहती है।
किसी को कोई बात समझाते समय अपना मुंह पूर्व दिशा में ही रखें। पढ़ते समय बच्चों का मुंह पूर्व दिशा में ही होना चाहिए। चलते समय कभी भी पैर घसीटकर न चलें।
जीवन में स्थायित्व लाने के लिए सदैव अपने पैन से ही हस्ताक्षर करें। इस बात का ध्यान रहे कि घर में कभी भी फालतू सामान, टूटे-फूटे फर्नीचर, कूड़ा कबाड़ तथा बिजली का सामान इकट्ठा न होने पाए। अन्यथा घर में बेवजह का तनाव बना रहेगा। फटे-पुराने जूते-मौजे, छाते, अण्डर गारमेंट्स आदि जितनी जल्दी हो सके घर से बाहर फैंक दें। नहीं तो घर में सकारात्मक ऊर्जा का सर्वथा अभाव रहेगा और व्यर्थ की परेशानियां घेरे रहेंगी।

फटे जूते मौजे और अण्डर गारमेंट्स प्रयोग में आने से शनि के नकारात्मक प्रभाव  भी झेलने  पडत़े हैं।

धन वृद्धि के लिए तिजोरी का मुंह सदैव उत्तर या पूर्व दिशा में ही होना चाहिए तथा जहां पर पैसे रखने हों वहां पर सुगंधित दृव्य या इत्र, परफ्यूम आदि नहीं रखने चाहिए। तिजोरी के दरवाजे पर कमल पर बैठी हुई तथा सफेद हाथियों के झुन्ड के अग्र भाग से नहलाई जाती हुई लक्ष्मी जी की एक तस्वीर लगाने से घर में निरंतर वृद्धि होती है।
दक्षिण की दीवार पर दर्पण कभी भी न लगाएं। दर्पण हमेशा पूर्व या उत्तर की दीवार पर ही लगाना चाहिए। फ्लोरिंग, दीवार या छत आदि पर दरारे नहीं पड़नी चाहिए। यदि ऐसा है तो उन्हें शीघ्र ही भरवा देना चाहिए। घर के किसी भी कोने में सीलन नहीं होनी चाहिए और न ही घर के किसी कोने में रात को अंधेरा रहना चाहिए। शाम को कम से कम 15 मिनट पूरे घर की लाइट अवश्य जलानी चाहिए।
बिजली के स्विच, मोटर, मेन मीटर, टी.वी., कम्प्यूटर आदि आग्नेय कोण में ही होने चाहिए इससे आर्थिक लाभ सुगमता से होता है। घर में पुस्तकें रखने का स्थान उत्तर या पूर्व में ही होना चाहिए तथा पुस्तकों को बंद अलमारी में ही रखना चाहिए। टेलीफोन के पास कभी भी पानी का ग्लास या चाय का कप नहीं रखना चाहिए। अन्यथा टेलीफोन ठीक से काम नहीं करेगा और उसमें कुछ न कुछ गड़बड़ होती रहेगी। घर में कभी भी मकड़ी के जाले नहीं लगने चाहिए नहीं तो राहु खराब होता है तथा राहु के बुरे फल भोगने पड़ते हैं।
घर में कभी भी महाभारत, युद्ध, उल्लू आदि की तस्वीर नहीं लगानी चाहिए। केवल शांत और सौम्य चित्रों से ही घर की सजावट करनी चाहिए। अविवाहित कन्याओं के कमरे में सफेद चांद का चित्र अवश्य लगाना चाहिए।
पूर्व की ओर मुख करके खाना खाने से आयु बढ़ती है। उत्तर की ओर मुख करके भोजन करने से आयु तथा धन की प्राप्ति होती है। दक्षिण की ओर मुख करके भोजन करने से प्रेतत्व की प्राप्ति होती है तथा पश्चिम की ओर मुख करके भोजन करने से व्यक्ति रोगी होता है। भोजन की थाली कभी भी एक हाथ से नहीं पकड़नी चाहिए। ऐसा करने से भोजन प्रेतयोनि में चला जाता है। भोजन की थाली को सदैव आदरपूर्वक दोनों हाथ लगाकर ही टेबल तक लाना चाहिए। यदि जमीन पर बैठकर खाना-खाना है तो भोजन की थाली को सीधे जमीन पर न रखकर किसी चौकी या आसन पर रखकर ही भोजन ग्रहण करना चाहिए।
सोते समय गृहस्वामी का सिर सदैव दक्षिण  की  तरफ ही होना चाहिए इससे आयु वृद्धि होती है एवं गृह स्वामी का पूर्ण प्रभुत्व घर पर बना रहता है। यदि प्रवास पर हों तो पश्चिम की ओर सिर करके ही सोना चाहिए। जिससे जितनी जल्दी हो सके अपने घर वापस आ सकें। घर में सीढ़ियों का स्थान पूर्व से पश्चिम या उत्तर से दक्षिण की ओर ही होना चाहिए, कभी भी उत्तर-पूर्व में सीढ़ियां न बनवाएं। सीढ़ियों की संखया हमेशा विषम ही होनी चाहिए जैसे- 11, 13, 15 आदि। यदि घर में सीढ़ियों के निर्माण संबंधी कोई दोष रह गया हो तो मिट्टी की कटोरी से ढक कर उस स्थान पर जमीन के नीचे दबा दें।
ऐसा करने से सीढ़ियों संबंधी वास्तु दोषों का नाश होता है। संध्या के समय घर में एक दीपक अवश्य जलाएं तथा ईश्वर से अपने द्वारा किए गये पापों के लिए क्षमा याचना करें। यदि धन संग्रह न हो पा रहा हो तो ''ऊँ श्रीं नमः'' मंत्र का जप करें एवं सूखे मेवे का भोग लक्ष्मी जी को लगाएं। यदि इन सब बातों का ध्यान रखा जाए तो विघ्न, बाधाएं, परेशानियां हमें छू भी नहीं सकेंगी, खुशियां हमारे घर का द्वार चूमेंगी, हमारे घर की सीढ़ियां हमारे लिए सफलता की सीढ़ियां बन जाएंगी तथा घर की बगिया हमेशा महकती रहेगी तथा घर का प्रत्येक सदस्य प्रगति करता रहेगा।

ये प्रयोग भी करें और ले चमत्कारी परिणाम

यदि आप अपने जीवन में कुछ परिवर्तन करना चाहते है तो ऐसा नियमित रूप से करेगे तो इससे आप का भाग्य और समय धीरे धीरे परिवर्तन होने लगेगा इस महीने में ब्रह्म बेला में उठ कर इश्वर का नाम , ध्यान , योग और पूजा करने से अकस्मात् लाभ होता है

1. सूर्योदय से पूर्व ब्रह्मा बेला में उठे , और अपने दोनों हांथो की हंथेली को रगरे और हंथेली को देख कर अपने मुंह पर फेरे, क्योंकि :- शास्त्रों में कहा गया है की
कराग्रे वसते लक्ष्मी, करमध्ये सरस्वती । करमूले स्थिता गौरी, मंगलं करदर्शनम् ॥
हमारे हाथ के अग्र भाग में लक्ष्मी, तथा हाथ के मूल मे सरस्वती का वास है अर्थात भगवान ने हमारे हाथों में इतनी ताकत दे रखी है,
ज़िसके बल पर हम धन अर्थात लक्ष्मी अर्जित करतें हैं। जिसके बल पर हम विद्या सरस्वती प्राप्त करतें हैं।इतना ही नहीं सरस्वती तथा लक्ष्मी जो हम अर्जित करते हैं, उनका समन्वय स्थापित करने के लिए प्रभू स्वयं हाथ के मध्य में बैठे हैं। ऐसे में क्यों न सुबह अपनें हाथ के दर्शन कर प्रभू की दी हुई ताकत का अहसास करते हुए तथा प्रभू के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए दिन की अच्छी शुरूवात करें।

2.मल , मूत्र , दातुन (मंजन) , भोजन करते समय मौन ( शांत ) रहे
3- . योग और प्राणायाम को नियमित जीवनचर्या में शामिल करे ,ऐसा करने से शरीर हमेशा निरोग रहता है,
4. . प्रातः अपने माता पिता गुरुजनों और अपने से बड़ों का आशीर्वाद ले , ऋषियों ने कहा है की जो भी माता बहन या भाई बंधू अपने घरों में रोज अपने से बड़ो या पति , सास -ससुर का रोज आशीर्वाद लेते है उनके घर में कभी अशांति नहीं आती है या कभी भी तलाक या महामरी नहीं हो टी है इशलिये अपने से बड़ो की इज्जत करें और उनका आशीर्वाद लें .
5 तिलक किये बिना और अपने सर को बिना ढके पूजा पाठ और पित्रकर्म या कोई भी शुभ कार्य न करें, जहाँ तक हो सके तिलक जरुर करें,
6. रोज नहा धोकर अपने शारीर को स्वक्ष करें , साफ वस्त्र पहने , गुरु और इश्वर का चिंतन करते हुए अपने काम को इश्वर की सेवा करते हुए करें, कुछ भी खाने पिने से पहले गाय, कुत्ता और कौवा का भोजन जरुर निकले, इश्को करने से आप के घर में अन्ना का भंडार हमेशा भरा रहेगा.
7.सोते समय अपना सिरहाना (सर ) पूर्व या दक्षिण दिशा की ओर रखने से धन व आयु की बढ़ोत्तरी होती है।उत्तर की ओर सिरहाना रखने से आयु की हानि होतीहै
8. कभी भी बीम या शहतीर के नीचे न बैठें और न ही सोयें । इससे देह पीड़ा या सिर दर्द होता है ।
9. अपने घर में तुलशी का पौधा लगायें ,
10-घर में पोछा लगाते समय पानी में नमक या सेंधा नमक डाल लें । घर में झाडू व पोंछा खुले स्थान पर न रखें ।
11-घर में टूटे-फूटे बतरन, टूटा दर्पण ( शीशा ), टूटी चारपाई या बैड न रखें । इनमें दरिद्रता का वास होता है।
12-यदि घर में कोइ घडी ठीक से नहीं चल रही हैं तो उन्हें ठीक करा लें ।बंद घड़ी गृहस्वामी के भाग्य को कम करती है ।
13-पूर्व की ओर मुंह करके भोजन करने से आयु, दक्षिण की ओर मुंह करके भोजन करने से प्रेत, पश्‍चिम की ओर मुंह करके भोजन करने से रोग व उत्तर की ओर मुंह करके भोजन करने से धन व आयु की प्राप्ति होती है ।
14- परोपकार का पालन करें, असहाय , गरीब और पशुओं और पर्यावरण की रक्षा करें
15- अपने धर्मं की रक्षा करें, मानव समाज की रक्षा करें, अपने देश और जन्मभूमि की रक्षा करें ,
16-मन वाणी और कर्म से सदाचार का पालन करें .
17- प्यार ही जीवन है खुद भी जियो और दूसरों को भी जीने दो ,

कुंडली बताती है कि क्या रत्न पहने और क्या ना पहने

रत्न सबके लिए नहीं होते, वे सुंदरता की वस्तु न होकर प्राणवान ऊर्जा के स्रोत के रूप में कार्य करते हैं। शुभ रत्नों का चयन करने के लिए अपने जन्म कुंडली में शुभ ग्रहों और लग्न की राशि के अनुसार करना चाहिए, अन्यथा प्रतिकूल रत्न लाभ के बजाय हानि भी कर सकता है। कई रत्न बड़े प्रभावशाली होते हैं और वे अपना प्रभाव तुरंत दिखाते है। रत्न पहनने के लिए दशा-महादशाओं का अध्ययन भी जरूरी है। केंद्र या त्रिकोण के स्वामी की ग्रह महादशा में उस ग्रह का रत्न पहनने से अधिक लाभ मिलता है।
जन्म कुंडली में त्रिकोण सदैव शुभ होता है इसलिए लग्नेश, पंचमेश व नवमेश का रत्न धारण किया जा सकता है। यदि इन तीनों में कोई ग्रह अपनी उच्च राशि या स्वराशि में हो तो रत्न धारण नहीं करना चाहिए। यदि शुभ ग्रह अस्त या निर्बल हो तो उसका रत्न पहनें ताकि उस ग्रह के प्रभाव को बढ़ाकर शुभ फल दे। यदि लग्न कमजोर है या लग्नेश अस्त है तो लग्नेश का रत्न पहनें। यदि भाग्येश निर्बल या अस्त है तो भाग्येश का रत्न पहनें। लग्नेश का रत्न जीवन-रत्न, पंचमेश का कारक-रत्न और नवमेश का भाग्य-रत्न कहलाता है। त्रिकोण का स्वामी यदि नीच का है, तो वह रत्न न पहने। कभी भी मारक, बाधक, नीच या अशुभ ग्रह का रत्न न पहनें। सभी रत्न शुक्ल पक्ष में निर्धारित वार व होरा में धारण किए जाने चाहिए।
जन्म लग्न के अनुसार करे रत्नों का चयन :-
मेष: इस लग्न वाले जातकों का अनुकूल रत्न मूंगा है जिसको शुक्ल पक्ष में किसी मंगलवार को मंगल की होरा में निम्न मंत्र से जाग्रत कर सोने में अनामिका अंगुली में धारण करना चाहिए। मंत्र- ऊँ भौं भौमाय नमः लाभ- मूंगा धारण करने से रक्त साफ होता है और रक्त, साहस और बल में वृद्धि होती है, महिलाओं के शीघ्र विवाह मंे सहयोग करता है, प्रेत बाधा से मुक्ति दिलाता है। बच्चों में नजर दोष दूर करता है। वृश्चिक लग्न वाले भी इसे धारण कर सकते हैं।
वृष: इस लग्न वाले जातकों के लिए अनुकूल रत्न हीरा तथा राजयोग कारक रत्न नीलम है। हीरा को शुक्ल पक्ष में किसी शुक्रवार को शुक्र की होरा में जाग्रत कर धारण करना चाहिए। मंत्र- ऊँ शुं शुक्राय नमः लाभ- हीरा धारण करने से स्वास्थ्य व साहस प्रदान करता है। समझदार बनाता है। शीघ्र विवाह कराता है। अग्नि भय व चोरी से बचाता है। महिलाओं में गर्भाशय के रोग दूर करता है। पुरुषों में वीर्य दोष मिटाता है। कहा गया है कि पुत्र की कामना रखने वाली महिला को हीरा धारण नहीं करना चाहिए अतः वे महिलाएं जो पुत्र संतान चाहती हैं या जिनके पुत्र संतान है उन्हें परीक्षणोपरांत ही हीरा धारण करना चाहिए। इसे तुला लग्न वाले जातक भी धारण कर सकते हैं।
मिथुन: इस लग्न वाले जातकों के लिए अनुकूल रत्न पन्ना है जिसे बुधवार को बुध की होरा में निम्न मंत्र से जाग्रत कर पहनना चाहिए। मंत्र- ऊँ बुं बुधाय नमः लाभ- पन्ना निर्धनता दूर कर शांति प्रदान करता है। परीक्षाओं में सफलता दिलाता है। खांसी व अन्य गले संबंधी बीमारियों को दूर करता है।इसके धारण करने से एकाग्रता विकसित होती है। काम, क्रोध आदि मानसिक विकारों को दूर करके अत्यंत शांति दिलाता है। कन्या लग्न वाले जातक भी इसे धारण कर सकते हैं।
कर्क: इस लग्न वाले जातकों के लिए अनुकूल रत्न मोती है जिसे सोमवार के दिन प्रातः चंद्र की होरा में पहनना चाहिए। पहनने के पहले रत्न को इस मंत्र से अवश्य जाग्रत कर लेना चाहिए। मंत्र- ऊँ सों सोमाय नमः लाभ- मोती धारण करने से स्मरण शक्ति प्रखर होती है। बल, विद्या व बुद्धि में वृद्धि होती है। क्रोध व मानसिक तनाव शांत होता है। अनिद्रा, दांत व मूत्र रोग में लाभ होता है। पुरुषों का विवाह शीध्र कराता है तथा महिलाओं को सुमंगली बनाता है। इस लग्न वाले यदि मूंगा भी धारण करें तो अत्यंत लाभ देता है क्योंकि मूंगा इस लग्न वाले व्यक्ति का राजयोग कारक रत्न होता है।
सिंह: इस लग्न वाले जातकांे का अनुकूल रत्न माणिक्य है। इसे रविवार को प्रातः रवि की होरा में निम्न मंत्र से जाग्रत कर धारण करना चाहिए। मंत्र- ऊँ घृणि सूर्याय नमः लाभ- माणिक्य धारण करने से साहस में वृद्धि होती है। भय, दुःख व अन्य व्याधियों का नाश होता है। नौकरी में उच्चपद व प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। अस्थि विकार व सिर दर्द की समस्या से निजात मिलती है। इस लग्न वाले व्यक्ति यदि मूंगा भी धारण करें तो अत्यंत लाभ देता है। क्योंकि इस लग्न वाले व्यक्ति का मूंगा राजयोग कारक रत्न होता है।
कन्या :- इस लग्न वाले जातकों के लिए अनुकूल रत्न पन्ना है जिसे बुधवार को बुध की होरा में निम्न मंत्र से जाग्रत कर पहनना चाहिए। मंत्र- ऊँ बुं बुधाय नमः , इस लग्न के लिए पन्ना , हीरा . नीलम रत्न शुभ होता है
तुला :- इस लग्न वाले जातकों के लिए अनुकूल रत्न हीरा तथा राजयोग कारक रत्न नीलम है। हीरा को शुक्ल पक्ष में किसी शुक्रवार को शुक्र की होरा में जाग्रत कर धारण करना चाहिए। मंत्र- ऊँ शुं शुक्राय नमः, हीरा , ओपेल
वृश्चिक :- इस लग्न वाले जातकों का अनुकूल रत्न मूंगा है जिसको शुक्ल पक्ष में किसी मंगलवार को मंगल की होरा में निम्न मंत्र से जाग्रत कर सोने में अनामिका अंगुली में धारण करना चाहिए। मंत्र- ऊँ भौं भौमाय नमः
धनु: इस लग्न वाले जातकों का अनुकूल रत्न पुखराज है जिसे शुक्ल पक्ष के किसी गुरुवार को प्रातः गुरु की होरा में निम्न मंत्र से जाग्रत कर धारण करना चाहिए। मंत्र- ऊँ बृं बृहस्पतये नमः लाभ: पुखराज धारण करने से बल, बुद्धि, ज्ञान, यज्ञ व मान-सम्मान में वृद्धि होती है। पुत्र संतान देता है। पापकर्म करने से बचाता है। अजीर्ण प्रदर, कैंसर व चर्मरोग से मुक्ति दिलाता है।
मकर :-इस लग्न वाले जातकों के लिए अनुकूल रत्न नीलम है जिसे शनिवार के दिन प्रातः शनि की होरा में निम्न मंत्र से जाग्रत कर धारण करना चाहिए। मंत्र- ऊँ शं शनैश्चराये नमः लाभ- नीलम धारण करने से धन, सुख व प्रसिद्धि में वृद्धि करता है। मन में सद्विचार लाता है। संतान सुख प्रदान करता है। वायु रोग, गठिया व हर्निया जैसे रोग में लाभ देता है। नीलम को धारण करने के पूर्व परीक्षण अवश्य करना चाहिए।
नीलम धारण करने से पूर्व कुशल ज्योतिषाचार्य से सलाह अवश्य ले लेनी चाहिए।
कुम्भ :- -इस लग्न वाले जातकों के लिए अनुकूल रत्न नीलम है जिसे शनिवार के दिन प्रातः शनि की होरा में निम्न मंत्र से जाग्रत कर धारण करना चाहिए। मंत्र- ऊँ शं शनैश्चराये नमः लाभ- नीलम धारण करने से धन, सुख व प्रसिद्धि में वृद्धि करता है।
मीन :- इस लग्न वाले जातकों का अनुकूल रत्न पुखराज है जिसे शुक्ल पक्ष के किसी गुरुवार को प्रातः गुरु की होरा में निम्न मंत्र से जाग्रत कर धारण करना चाहिए। मंत्र- ऊँ बृं बृहस्पतये नमः
मिथुन, कन्या, वृश्चिक, धनु, कुंभ व मीन लग्न वाले जातक पुखराज धारण कर सकते हैं। वृष, कर्क, सिंह, तुला और मकर लग्न वाले जातक पुखराज धारण न ही करें तो अच्छा है।
मेष लग्न वाले जातकों को भी वर्जित है परंतु यदि गुरु जन्म कुंडली के प्रथम, पंचम व नवम भावस्थ हो तो धारण करें। अच्छा है। जिस कन्या का विवाह न हो रहा हो उसे अवश्य धारण करना चाहिए परंतु उसकी लग्न या राशि, धनु या मीन होनी चाहिए।
रत्न सारणी लग्न स्वामी ग्रह रत्न धातु मित्र रत्न शत्रु रत्न
मेष, वृश्चिक मंगल मूंगा सोना माणिक्य, मोती, पुखराज पन्ना वृष, तुला शुक्र हीरा सोना पन्ना, नीलम माणिक्य, मोती मिथुन, कन्या बुध पन्ना सोना/ कांसा माणिक्य, हीरा मोती कर्क चंद्रमा मोती चांदी माणिक्य, पन्न्ना –
सिंह सूर्य माणिक्य सीसा मोती, मूंगा, पुराखराज माणिक  , मोती, मूँगा ,मकर, कुंभ शनि नीलम लोहा/ सीसा पन्ना, हीरा
माणिक , मोती, मूंगा धनु, मीन गुरु पुखराज सोना/ चांदी मोती, मूंगा, माणिक्य हीरा, नीलम रत्न धारण करने में हाथ का चयन: चिकित्सा शास्त्र की मान्यता है कि पुरुष का दायां हाथ व महिला का बांया हाथ गर्म होता है। इसी प्रकार पुरुष का बांया हाथ व महिला का दांया हाथ ठंडा होता है। रत्न भी अपनी प्रकृति के अनुसार ठंडे व गर्म होते हैं। यदि ठंडे रत्न, ठंडे हाथ में व गर्म रत्न गर्म हाथ में धारण किये जाएं तो आशातीत लाभ होता है। प्रकृति के अनुसार गर्म रत्न – पुखराज, हीरा, माणिक्य, मूंगा। प्रकृति के अनुसार ठंडे रत्न – मोती, पन्ना, नीलम, गोमेद, लहसुनिया। रत्न मर्यादा- रत्न को धारण करने के बाद उसकी मर्यादा बनायी रखनी चाहिए। अशुद्ध स्थान, दाह-संस्कार आदि में रत्न पहन कर नहीं जाना चाहिए। यदि उक्त स्थान में जाना हो तो उसे उतार कर देव-स्थान में रखना चाहिए तथा पुनः निर्धारित समय में धारण करना चाहिए। इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि रत्न शुक्ल पक्ष के दिन निर्धारित वार की निर्धारित होरा में धारण किये जाएं। खंडित रत्न कदापि धारण नहीं करना चाहिए।