Thursday, 12 August 2021

अकेले अनदेखे ग्रह का प्रभाव

जब कोई ग्रह कुंडली में किसी भी भाव में अकेला बैठा हो और उस पर किसी भी ग्रह की दृष्टि न पड़ रही हो तो उसके फल में विशेषता आ जाती है जो कि निम्न प्रकार की होगी-

 

सूर्य - अकेला सूर्य किसी भाव में हो और उस पर किसी भी ग्रह की दृष्टि न हो तो जातक अपने बूते पर तरक्की करता है और धनवान बनता है।

 

चंद्र -  अकेला चंद्र किसी भाव में हो और उस पर किसी भी ग्रह की दृष्टि न हो तो ऐसा जातक अपने कुल की रक्षा करने वाला, दयालु व नम्र स्वभाव का होता है। किसी भी विपरीत परिस्थिति में अपने आप को बचाने की अद्भुत शक्ति उसमें होती है।

 

मंगल - अकेला मंगल किसी भी भाव में हो और उस पर किसी भी ग्रह की दृष्टि न हो तो जातक बहादुर तो बनता है पर वह स्वतंत्र नहीं रहता। उसे अपनी शक्तियों का अहसास नहीं रहता।

 

बुध - अकेला बुध किसी भी भाव में हो और उस पर किसी भी ग्रह की दृष्टि न हो तो जातक लोभी, लालची रहता है। देश विदेश में आवारा सा घूमता है।

 

गुरु - अकेला गुरु किसी भी भाव में हो और उस पर किसी भी ग्रह की दृष्टि न हो तो जातक के जीवन पर कोई भी अशुभ प्रभाव नहीं डालता।

 

शुक्र - अकेला शुक्र किसी भी भाव में हो और उस पर किसी भी ग्रह की दृष्टि न हो तो जातक पर कोई भी अशुभ प्रभाव नहीं डालता।

 

शनि - अकेला शनि किसी भी भाव में हो और उस पर किसी भी ग्रह की दृष्टि न हो तो सामान्य फल देता है।

 

राहु - अकेला राहु किसी भी भाव में हो और उस पर किसी भी ग्रह की दृष्टि न हो तो जातक किसी की परवाह नहीं करता। जातक की रक्षा वह अवश्य करता है किंतु आर्थिक दृष्टि से सामान्य ही रखता है।

 

केतु -  केतु अकेला किसी भी भाव में हो और उस पर किसी भी ग्रह की दृष्टि न पड़ रही हो तो जातक को हर तरह से ताकतवर बनाता है। वह जातक को आर्थिक दृष्टि से सामान्य ही रखता है।

Wednesday, 11 August 2021

विभिन्न ग्रहों के दुष्परिणाम कम करने के लिए कुछ सामान्य उपाय व परहेज -:

सूर्य - रिश्वतखोरी न करें। अपना चरित्र उत्तम रखें। पिता का सम्मान करें। विष्णु पूजा करें। गेहूं, गुड़ और तांबे का दान करें। तांबे का पैसा बहते हुए पानी में बहाएं।

 

चंद्र - माता व दादी का सम्मान करें। गंगा स्नान करें। शिव पूजा करें। चांदी, चावल और दूध का दान करें।

 

मंगल - भाई, मित्र व संबंधी के साथ विश्वासघात न करें। शुद्ध चांदी शरीर पर धारण करें। मसूर की दाल बहते हुए पानी में बहाएं। हनुमानजी की पूजा करें।

 

बुध- बहन, बेटी, बुआ व मौसी से आशीर्वाद प्राप्त करें। सुराख वाले तांबे का पैसा प्रवाहित करें। मां दुर्गा की पूजा करें।

 

गुरु-  देवता, ब्राह्मण, पिता व गुरु की पूजा करें। धार्मिक पुस्तकें दान करें। ब्रह्माजी की उपासना करें।

 

शुक्र - अपनी स्त्री का सम्मान करें। गाय की सेवा करें। लक्ष्मी की उपासना करें। गोदान करें।

 

शनि -  मीट और शराब का सेवन न करें। चाचा व ताऊ का सम्मान करें। नौकरों को प्रसन्न रखें। भैरो जी की उपासना करें।

 

राहु -  ससुराल से संबंध न बिगाड़ें। बिजली का सामान घर में ठीक से रखें। सरस्वती का पूजन करें। केतु -  काला सफेद कुत्ता घर में पालें। गणेश जी की आराधना करें। कुत्ते को न मारें।

दान संबंधी उपाय

– नीच ग्रह की वस्तुओं का दान कभी भी न लें। यदि ग्रह उच्च का हो तो ग्रह संबंधी दान न करें।

 

– चंद्र अगर जन्मकुंडली के छठे घर में हो तो ऐसे जातक को पानी की प्याऊ लगाना, धर्मशाला का निर्माण कराना, कुएं खुदवाना, गरीबों को भोजन खिलाना, गोदान करना आदि सभी जनकल्याण के कार्य कतई नहीं करने चाहिए। ऐसा करने से वंश वृद्धि रुक जाती है।

 

– जन्मकुंडली के आठवें घर में शनि होने पर भोजन, धन, वस्त्र, गाय आदि का दान नहीं करना चाहिए। जन्मकुंडली के पांचवें घर में बृहस्पति बैठा हो तो धन का दान न करें।

 

- जन्मकुंडली के नौवें घर में बृहस्पति बैठा हो तो मंदिर या किसी भी धार्मिक कार्य के लिए दान नहीं करना चाहिए।

 

– जन्मकुंडली के नौवें घर में शुक्र बैठा हो तो धन या अनाज से संबंधित दान नहीं करना चाहिए। –

 

- जन्मकुंडली के बारहवें घर में चंद्र बैठा हो तो पंडित या अन्य किसी व्यक्ति से कोई भी धार्मिक कार्य संपन्न नहीं कराना चाहिए और न ही दान देना चाहिए।

 

– जन्मकुंडली के सातवें घर में बृहस्पति बैठा हो तो पुरोहित को धन या अनाज दान में न दें।

 

– जन्मकुंडली के छठे घर में शनि अशुभ हो तो निकट संबंधी के विवाह में शामिल न हों या उसे विवाह के लिए आर्थिक सहयोग न दें।

 

– किसी कन्या के विवाह के लिए आप स्वयं धन खर्च करें। अपने पुत्र या पत्नी से न करवाएं।

 

– जन्मकुंडली के दूसरे घर में राहु हो तो तेल या चिकनाईवाले पदार्थों का दान नहीं करना चाहिए।

 

– जन्मकुंडली में शुक्र चैथे घर में बैठा हो और साथ में राहु भी हो तो सोना दान में नहीं देना चाहिए। जन्मकुंडली के आठवें घर में राहु सूर्य के साथ बैठा हो तो कन्या के विवाह के अवसर पर ब्राह्मण को दान न दें।

 

– शनि अशुभ चल रहा हो तो चांदी का दान न करें।

 

– जन्मकुंडली के सातवें घर में केतु बैठा हो तो लोहा या लोहे की वस्तु का दान न करें। –

 

- जन्मकुंडली के चैथे घर में मंगल बैठा हुआ हो तो वस्त्र दान कभी नहीं करना चाहिए।

 

आम उपाय

– हमेशा सच बोलें। कोर्ट या कचहरी में झूठी गवाही न दें।

– दूसरों की निंदा न करें। खुदगर्ज न बनें।

– माता-पिता का यथोचित आदर करें और उनके आज्ञाकारी रहें।

– तीर्थयात्रा अवश्य करें।

– गाय के बछड़े को स्नेह से पालें।

– पूरियां घी में तलकर गरीबों को खिलाएं।

– शनि विपरीत चल रहा हो तो सफेद वस्त्र में काले तिल बांधकर पानी में प्रवाहित करें। तिल-गुड़ की बनी रेवड़ियां बांटें।

— सोते समय सिरहाने दूध से भरा बर्तन रखें। प्रातः उठकर बिना किसी से कुछ बोले वह दूध बरगद के पेड़ में डालें।

भवन संबंधी दुर्लभ उपाय

गृह प्रवेश से पहले तुलसी का पौधा, अपने इष्ट देवता की तस्वीर, पानी से भरा कलश एवं गाय को प्रवेश कराना अति शुभकारी होता है। इससे घर में सुख-शांति आती है और संपन्नता बढ़ती है।
– भवन की नींव भरते समय शहद से भरा बरतन दबा दें। इससे जातक आजीवन खतरों से मुक्त रहेगा।
– जन्मकुंडली में शनि अशुभ हो तो गृह निर्माण करने से पूर्व गोदान करें।
– शनि जन्मकुंडली के चैथे घर में स्थित हो तो जातक को पैतृक भूमि पर मकान नहीं बनाना चाहिए। यदि जातक ऐसा करता है तो परिवार के सदस्यों को जिदंगीभर कष्ट उठाने पड़ते हैं। पुत्र रोगी रहता है। तंदुरूस्त होने की हालत में किसी झूठे मुकदमे में फंसकर कारावास की सजा उसे भुगतनी पड़ती है। शनि जन्मकुंडली के छठे घर में हो तो भवन निर्माण के पूर्व उस भूमि पर हवनादि करें और जमीन को शुद्ध कर लें। इससे केतु का प्रभाव मंदा पड़ जाता है।
– जन्मकुंडली के ग्यारहवें घर में शनि हो तो मुख्य द्वार की चैखट बनाने से पूर्व उसके नीचे चंदन दबा दें।
– एक बार भवन निर्माण का कार्य प्रारंभ हो जाए तो बीच में उसे रोकें नहीं अन्यथा अधूरे मकान में राहु का वास होगा।
– भवन निर्माण शुरू कराने से पूर्व भवन निर्माण करने वालों (कारीगरों) को मिष्ठान खिलाएं।
– भवन निर्माण से पूर्व मकान की जमीन पर ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए।
– भवन निर्माण करते समय जमीन में से या जमीन पर चींटियां निकलें तो उन चींटियों को शक्कर एवं आटा मिलाकर खिलाएं।
– भवन के मालिक की जन्मकुंडली में पांचवें घर में केतु हो तो भवन निर्माण से पहले केतु का दान अवश्य दें। संतान संबंधी उपाय – संतान प्राप्ति के लिए ‘संतान गोपाल स्तोत्रम’ का पाठ करें। गणेशजी की आराधना करें।
– संतान नहीं हो रही हो तो अपने भोजन का आधा हिस्सा गाय को खिलाएं तथा संतान को रोगमुक्त करने के लिए भी गाय को भोजन खिलाएं। जातक पीपल के पेड़ का जलसिंचन करें।
– संतान को दीर्घायु बनाने के लिए पिता को बृहस्पतिवार का व्रत करना चाहिए। – अपनी पत्नी को उचित सम्मान दें। रोग मुक्ति के लिए – रोग मुक्ति के लिए अपने भोजन का चैथाई हिस्सा गाय को और चैथाई हिस्सा कुत्ते को खिलाएं।
– घर में कोई बीमार हो जाए तो उस रोगी को शहद में चंदन मिलाकर चटाएं।
– पुत्र रोगी हो तो कन्याओं को हलवा खिलाएं।
– केतु के अनिष्ट प्रभाव के कारण रोग हो जाए तो तंदूर की मीठी रोटी कौए को खिलाएं।
– पत्नी बीमार हो तो गोदान करें।
– पुत्री बीमार हो तो पीपल के पेड़ की लकड़ी उसके सिरहाने रखें। – मंदिर में गुप्त दान करें। – रविवार के दिन बूंदी के सवा किलो लड्डू मंदिर में प्रसाद के रूप में बांटें।
– सिरदर्द होता हो तो चंदन और केसर का तिलक रोगी के सिर पर लगाएं।

Monday, 9 August 2021

गृह का प्रभाव कुंडली के अलग अलग भाव मे पहुचाने के लिए कुछ उपाय


प्रथम भाव में ग्रह का प्रभाव पहुचांने के लिए संबंधित वस्तु को गले में धारण करना चाहिए

* द्वितीय भाव में ग्रह का प्रभाव पहुचांने के लिए संबंधित वस्तु को देवी - देवता को अर्पित करना चाहिए
* तृतीय भाव में ग्रह का प्रभाव पहुचांने के लिए संबंधित वस्तु को बाजू / हाथ में धारण करना चाहिए
* चतुर्थ भाव में ग्रह का प्रभाव पहुचांने के लिए संबंधित वस्तु को जल प्रवाह करें या पर्स में रखें
* पंचम भाव में ग्रह का प्रभाव पहुचांने के लिए संबंधित वस्तु को शिक्षा संस्थान में पहुंचाए या विद्यार्थी को दान करें
* छ्ठे भाव में ग्रह का प्रभाव पहुचांने के लिए संबंधित वस्तु को गड्ढे / कुएं / बरसाती नाले में गिराएं
* सप्तम भाव में ग्रह का प्रभाव पहुचांने के लिए संबंधित वस्तु को मिट्टी में दबाएं
* अष्टम भाव में ग्रह का प्रभाव पहुचांने के लिए संबंधित वस्तु को श्मशान / खाली जमीन में दबाएं
* नवम भाव में ग्रह का प्रभाव पहुचांने के लिए संबंधित वस्तु को संगत में बांटे
* दसम भाव में ग्रह का प्रभाव पहुचांने के लिए संबंधित वस्तु का सरकारी जमीन पर उपाये करें या सरकारी कर्मचारी को दान करे
* एकादश भाव में विराजमान ग्रह के लिए ग्रह से संबंधित रंग का रुमाल उपयोग में लाएं ।
* द्वादश भाव में ग्रह का प्रभाव पहुचांने के लिए संबंधित वस्तु को छत पर रखें कारक ग्रह को धारण करने का उपाये : किसी भी कारण वश किसी भाव से संबंधित फल प्राप्ति में बाधा का अनुभव हो तो उस भाव के कारक ग्रह के उपाये के तौर पर जातक को ग्रह से संबंधित जड़ी / ओषधि जल में मिला कर स्नान ज़रूर करना चाहिए, जैसे कि गुरु ग्रह 2, 5, 9, 12वे भाव का कारक ग्रह है तो जब भी इन में से किसी भाव से फल प्राप्ति में बाधा का अनुभव हो तो बाकी उपायों के साथ जातक को जल में हल्दी मिला कर स्नान करना चाहिए , प्रथम भाव के लिए बेल के पत्ते जल में मिला कर स्नान करें, तृतीय भाव के लिए नीम के पत्ते , चतुर्थ भाव के लिए जल में दूध मिला कर , छ्ठे भाव के लिए दूर्वा जल में मिला कर, सप्तम भाव के लिए हरी इलायची पानी में उबाल कर उस पानी को स्नान करने वाले जल में मिला दें , अष्टम और दसम भाव के लिए स्नान से पहले सरसो का तेल से मालिश करें , एकादश भाव के लिए जल में काले तिल मिला कर स्नान करें , यह उपाये लगातार 43 दिन करना चाहिए ।

कालपुरूष कुण्डली अनुसार नीच ग्रह के दान का उपाय
जैसे कि किसी की जन्म कुण्डली में चतुर्थ भाव में पापी ग्रह होकर सुख स्थान को खराब कर रहे हो तो , कालपुरुष कुण्डली अनुसार चतुर्थ भाव में मंगल नीच का होता है, इस लिए ऐसे जातक को सुख स्थान की शूभता के लिए मंगल से संबंधित दान करने चाहिए , इसी तरह लग्न भाव में शनि नीच का होता है तो लग्न भाव की शूभता के लिए शनि के दान किये जा सकते हैं ।

एक ही भाव में दो शत्रु ग्रह हो जैसे कि जन्म कुण्डली के किसी भी भाव में सूर्य शनि की युति हो तो इस स्थिति में उस भाव की शूभता के लिए बुध ग्रह को उस भाव में स्थापित करना चाहिए क्योंकि बुध ग्रह दोनो का मित्र ग्रह है इस तरह बुध के उपाये से सूर्य शनि का झगड़ा खत्म हो जाएगा और भाव से शुभ फल आने लगेंगे।

ज्योतिष अनुसार राहु के फल राहू कूटनीति का सबसे बड़ा ग्रह है राहू संघर्ष के बाद सफलता दिलाता है यह कई महापुरुषों की कुंडलियो से स्पष्ट है राहू का 12 वे घर में बैठना बड़ा अशुभ होता है क्योकि यह जेल और बंधन का मालिक है 12 वे घर में बैठकर अपनी दशा, अंतरदशा में या तो पागलखाने में या अस्पताल और जेल में जरूर भेजता है। किसी भी कुंडली में राहू जिस घर में बैठता है 19 वे वर्ष में उसका फल दे कर 20 वे वर्ष में नष्ट कर देता है राहू की महादशा 18 वर्ष की होती है। राहू चन्द्र जब भी एक साथ किसी भी भाव में बैठे हुए हो तो चिंता का योग बनाते है। राहू की अपनी कोई राशी नहीं है वह जिस ग्रह के साथ बैठता है वहा तीन कार्य करता है।

ज्योतिष अनुसार शुभ अशुभ भावो के प्रकार कुण्डली के त्रिकोण भाव जन्म कुण्डली के 1, 5, 9वे भावो को त्रिकोण भाव कहा जाता है । इन भावो के स्वामी ग्रह की दशा हमेशा ही शुभ फल देते हुए व्यक्ति की सामाजिक पद प्रतिष्ठा में वृद्धि करती है, जातक को नई चीजें सीख कर आगे बढ़ने के अवसर प्राप्त होते हैं , एक तरह से जातक का personality development इन भाव से संबंधित दशा में होता है ऐसा कह सकते हैं । हालांकि लग्न की स्थिति के आधार पर अगर त्रिकोण भाव का स्वामी ग्रह 6, 8, 12वे का भी स्वामी हो तो शुभ प्रभाव में कमी आती है

Friday, 30 October 2020

रावण सहिंता के अनुसार पारद शिवलिंग एवं पारद श्री यंत्र का महत्व

 …………. पारद (पारा) को रसराज कहा जाता है। पारद से बने शिवलिंग की पूजा करने से बिगड़े काम भी बन जाते हैं। धर्मशास्त्रों के अनुसार पारद शिवलिंग साक्षात भगवान शिव का ही रूप है इसलिए इसकी पूजा विधि-विधान से करने से कई गुना फल प्राप्त होता है तथा हर मनोकामना पूरी होती है। घर में पारद शिवलिंग सौभाग्य, शान्ति, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा के लिए अत्यधिक सौभाग्यशाली है। दुकान, ऑफिस व फैक्टरी में व्यापारी को बढाऩे के लिए पारद शिवलिंग का पूजन एक अचूक उपाय है। शिवलिंग के मात्र दर्शन ही सौभाग्यशाली होते  है। इसके लिए किसी प्राणप्रतिष्ठा की आवश्कता नहीं हैं। 

पर इसके ज्यादा लाभ उठाने के लिए इसे रावण सहिंता के अनुसार आपके जन्म नक्षत्र मे ही तन्त्रोक्त विधि द्वारा पारा को ठोस करके  निर्मित किया जाना चाहिए। 

 पूजन की विधि ……………………

 सर्वप्रथम शिवलिंग को सफेद कपड़े पर आसन पर रखें। स्वयं पूर्व-उत्तर दिशा की ओर मुँह करके बैठ जाए।अपने आसपास जल, गंगाजल, रोली, मोली, चावल, दूध और हल्दी, चन्दन रख लें। सबसे पहले पारद शिवलिंग के दाहिनी तरफ दीपक जला कर रखो।थोडा सा जल हाथ में लेकर तीन बार निम्न मन्त्र का उच्चारण करके पी लें। प्रथम बार ॐ मुत्युभजाय नम: दूसरी बार ॐ नीलकण्ठाय: नम: तीसरी बार ॐ रूद्राय नम: चौथी बार ॐशिवाय नम: हाथ में फूल और चावल लेकर शिवजी का ध्यान करें और मन में ''ॐ नम: शिवाय`` का 5 बार स्मरण करें और चावल और फूल को शिवलिंग पर चढ़ा दें। इसके बाद ॐ नम: शिवाय का निरन्तर उच्चारण करते रहे। फिर हाथ में चावल और पुष्प लेकर ''ॐ पार्वत्यै नम:`` मंत्र का उच्चारण कर माता पार्वती का ध्यान कर चावल पारा शिवलिंग पर चढ़ा दें। इसके बाद ॐ नम: शिवाय का निरन्तर उच्चारण करें। फिर मोली को और इसके बाद बनेऊ को पारद शिवलिंग पर चढ़ा दें। इसके पश्चात हल्दी और चन्दन का तिलक लगा दे। चावल अर्पण करे इसके बाद पुष्प चढ़ा दें। मीठे का भोग लगा दे। भांग, धतूरा और बेलपत्र शिवलिंग पर चढ़ा दें। फिर अन्तिम में शिव की आरती करे और प्रसाद आदि ले लो। जो व्यक्ति इस प्रकार से पारद शिवलिंग का पूजन करता है इसे शिव की कृपा से सुख समृद्धि आदि की प्राप्ति होती है। 

लाभ


इसे घर में स्थापित करने से भी कई लाभ हैं, जो इस प्रकार हैं………………… 

 पारद शिवलिंग सभी प्रकार के तन्त्र प्रयोगों को काट देता है. 

पारद शिवलिंग पति पत्नी के बीच के ग्रह क्लेश को धीरे धीरे पूर्णतः समाप्त कर जीवन को सुखमय बना देता है |

पारद शिवलिंग जहां स्थापित होता है उसके १०० फ़ीट के दायरे में उसका प्रभाव होता है. इस प्रभाव से परिवार में शांति और स्वास्थ्य प्राप्ति होती है. 

य़दि बहुत प्रचण्ड तान्त्रिक प्रयोग या अकाल मृत्यु या वाहन दुर्घटना योग हो तो ऐसा शुद्ध पारद शिवलिंग उसे अपने ऊपर ले लेता है. ऐसी स्थिति में यह अपने आप टूट जाता है, और साधक की रक्षा करता है. 

पारद शिवलिंग की स्थापना करके साधना करने पर स्वतः साधक की रक्षा होती रहती है.विशेष रूप से महाविद्या और काली साधकों को इसे अवश्य स्थापित करना चाहिये. 

पारद शिवलिंग को घर में रखने से सभी प्रकार के वास्तु दोष स्वत: ही दूर हो जाते हैं साथ हीघर का वातावरण भी शुद्ध होता है। 

पारद शिवलिंग साक्षात भगवान शिव का स्वरूप माना गया है। इसलिए इसे घर में स्थापित कर प्रतिदिन पूजन करने से किसी भी प्रकार के तंत्र का असर घर में नहीं होता और न ही साधक परकिसी तंत्र क्रिया का प्रभाव पड़ता है। 

यदि किसी को पितृ दोष हो तो उसे प्रतिदिन पारद शिवलिंग की पूजा करनी चाहिए। इससे पितृ दोष समाप्त हो जाता है।


शुद्ध पारद शिवलिंग बाजार मे मिलने वाले शिवलिंग से अत्यंत दुर्लभ और चमत्कारी होता है क्योंकि इसे मंत्रो द्वारा ठोस करके निर्मित किया जाता है |जबकि बाजार मे मिलने वाले पारद शिवलिंग कापर सल्फेट के द्वारा निर्मित किया जाता है |


यहा प्राकृतिक तरीके से पारद शिवलिंग निर्माण के कुछ तस्वीरे दे रहा हूँ 



आग्रह प्राप्त होने पर यदि समस्या गंभीर है तो ही  पूर्णतः तान्त्रोक्त  विधि से पारद शिवलिंग एवं पारद श्रीयंत्र निर्माण किए जाते है |














लक्ष्मी प्राप्ति साधना

अगर आपको अचानक पैसे रुपए की ज़रुरत पड़ जाए तो आप क्या करेंगे?

नहीं समझ आया तो हम बताते हैं।

दीपावली पर लक्ष्मीजी की पूजा गणेश जी के साथ की  जाती है.लेकिन अगर अचानक रूपये पैसे की तंगी हो जाये

तो लक्ष्मी माता को नहीं, बल्कि उनके पुत्रों को पुकारिये.जब लक्ष्मी जी के पुत्रों का नाम लेंगे, तो मां दौड़ी चली आयेंगी.ये ममता ही तो है, जो मां को बच्चों से जोड़ती है.गणेश जी लक्ष्मी जी के मानस पुत्र हैं. वैसे तो लक्ष्मी जी चंचला हैं, एक स्थान पर नहीं टिकतीं |

लेकिन दो स्थानों पर लक्ष्मी जी सदा निवास करती हैं.

पहला वह स्थान जहां विष्णु जी का अभिषेक दक्षिणावर्ती शंख से किया जाये |

दूसरा वह स्थान, जहां गणपति की आराधना की जाये |

और यह तीसरा उपाय है लक्ष्मी जी के 18 पुत्रों का नाम जपना.वैसे तो लक्ष्मी जी वहां सदानिवास करती हैं,जहां गणपति पूजे जाते हैं, लेकिन अचानक रुपये चाहिये तो एक नहीं, बल्कि लक्ष्मी जी के अनेक पुत्रों के नाम लेना होगा.

ऋग्वेद में लक्ष्मी जी के 4 पुत्रों का नाम इस श्लोक में आये है

-आनंद: कर्दम: श्रीदश्चिकलीत इति विश्रुता:

-ऋषय: श्रिय: पुत्राश्व मयि श्रीर्देवी

देवता (4/5/4/6)

लेकिन आकस्मिक धन पाने के लिये आपको लक्ष्मी जी के 18 वर्ग पुत्रों के नाम लेने होंगे,इसके बाद धन की व्यवस्था स्वयं लक्ष्मी जी आकर करती हैं.

कैसे मिलेगा आकस्मिक धन?

अगर अचानक कारोबार में घाटा हो जाये, शेयर बाज़ार में पैसे डूब जायें,अच्छी भली नौकरी चली जाये या फिर कोई प्राकृतिक आपदा आ जाये,ऐसे में धन की आवश्यकता सबको पड़ सकती है.बस ऐसी ही परिस्थिति में, लक्ष्मी जी के 18 पुत्रों का नाम,शुक्रवार से जपना शुरू कर दें और साथ मे उन्हे गुलाब का कम-से-कम एक पुष्प अर्पित करे. 

लक्ष्मी जी के 18 पुत्रों के नाम,

- ॐ देवसखाय नम:

- ॐ चिक्लीताय नम:

- ॐ आनन्दाय नम:

- ॐ कर्दमाय नम:

- ॐ श्रीप्रदाय नम:

- ॐ जातवेदाय नम:

- ॐ अनुरागाय नम:

- ॐ सम्वादाय नम:

- ॐ विजयाय नम:

- ॐ वल्लभाय नम:

- ॐ मदाय नम:

- ॐ हर्षाय नम:

- ॐ बलाय नम:

- ॐ तेजसे नम:

- ॐ दमकाय नम

- ॐ सलिलाय नम:

- ॐ गुग्गुलाय नम:

- ॐ कुरूण्टकाय नम:


तो अगर आप भी किसी ऐसी परिस्थिति के शिकार हैं, जिसमें अचानक से पैसे रूपये चाहिये, तो यह उपाय शुक्रवार से आज़मायें.मां तो मां है,फिर लक्ष्मी ही क्यों न हों, बेटों के नाम पुकारेंगे तो मां दौड़ी चली आयेगी.


अगर आपसे संभव हो तो मंत्र का जाप भी करे,"ओम नम:कमलवासिन्यै स्वाहा".

इस मंत्र का जाप आप रोजाना कर सकते है,सिर्फ मंत्र जाप हेतु शुद्धता का ध्यान रखिये.माँ आप पर कृपा बरसाये यही कामना करता हू

शरद पूर्णिमा पर यह काम करेंगे तो सालभर रहेगे स्वस्थ और होगी धनप्राप्ति

आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को ‘शरद पूर्णिमा’ बोलते हैं । शरद पूर्णिमा की रात्रि पर चंद्रमा पृथ्वी के सबसे निकट होता है और अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण रहता है। इस रात्रि में चंद्रमा का ओज सबसे तेजवान और ऊर्जावान होता है। पृथ्वी पर शीतलता, पोषक शक्ति एवं शांतिरूपी अमृतवर्षा करता है । इस साल 30 अक्टूबर की रात में खीर बनाकर खानी है व 31 अक्टूबर को व्रत-पूजन करना है।


इस दिन रास-उत्सव और कोजागर व्रत किया जाता है । गोपियों को शरद पूर्णिमा की रात्रि में भगवान श्रीकृष्ण ने बंसी बजाकर अपने पास बुलाया और ईश्वरीय अमृत का पान कराया था ।

यूं तो हर माह में पूर्णिमा आती है, लेकिन शरद पूर्णिमा का महत्व उन सभी से कहीं अधिक है। हिंदू धर्म ग्रंथों में भी इस पूर्णिमा को विशेष बताया गया है।
शरद पूर्णिमा से जुड़ी बातें....*

इस दिन चंद्रमा की किरणें विशेष अमृतमयी गुणों से युक्त रहती हैं, जो कई बीमारियों का नाश कर देती हैं। यही कारण है कि शरद पूर्णिमा की रात को लोग अपने घरों की छतों पर खीर रखते हैं, जिससे चंद्रमा की किरणें उस खीर के संपर्क में आती है, इसके बाद उसे खाया जाता है।

नारद पुराण के अनुसार शरद पूर्णिमा की धवल चांदनी में मां लक्ष्मी अपने वाहन उल्लू पर सवार होकर अपने कर-कमलों में वर और अभय लिए निशिद काल में पृथ्वी पर भ्रमण करती है। माता यह देखती है कि कौन जाग रहा है?
यानी अपने कर्तव्‍यों को लेकर कौन जागृत है? जो इस रात में जागकर मां लक्ष्मी की उपासना करते हैं, मां उन पर असीम कृपा करती है।*

वैज्ञानिक भी मानते हैं कि शरद पूर्णिमा की रात स्वास्थ्य व सकारात्मकता देने वाली मानी जाती है क्योंकि चंद्रमा धरती के बहुत समीप होता है। शरद पूर्णिमा की रात चन्द्रमा की किरणों में खास तरह के लवण व विटामिन आ जाते हैं। पृथ्वी के पास होने पर इसकी किरणें सीधे जब खाद्य पदार्थों पर पड़ती हैं तो उनकी क्वालिटी में बढ़ोतरी हो जाती है।

शरद पूर्णिमा के शुभ अवसर पर सुबह उठकर व्रत करके अपने इष्ट देव का पूजन करना चाहिए। इन्द्र और महालक्ष्मी जी का पूजन करके घी का दीपक जलाकर, गंध पुष्प आदि से पूजन करना चाहिए। ब्राह्मणों को खीर का भोजन कराना चाहिए और उन्हें दान दक्षिणा प्रदान करनी चाहिए।

लक्ष्मी प्राप्ति के लिए इस व्रत को विशेष रूप से किया जाता है। कहा जाता है कि इस दिन जागरण करने वाले की धन-संपत्ति में वृद्धि होती है।

शरद पूनम की रात को क्या करें, क्या न करें ?

अश्विनी कुमार देवताओं के वैद्य हैं । जो भी इन्द्रियाँ शिथिल हो गयी हों, उनको पुष्ट करने के लिए चन्द्रमा की चाँदनी में खीर रखना और भगवान को भोग लगाकर अश्विनी कुमारों से प्रार्थना करना कि ‘हमारी इन्द्रियों का बल-ओज बढ़ायें ।’ फिर वह खीर खा लेना ।

इस रात सूई में धागा पिरोने का अभ्यास करने से नेत्रज्योति बढ़ती है ।

शरद पूर्णिमा की चन्द्रमा की चाँदनी गर्भवती महिला की नाभि पर पड़े तो गर्भ पुष्ट होता है ।

अमावस्या और पूर्णिमा को चन्द्रमा के विशेष प्रभाव से समुद्र में ज्वार-भाटा आता है । जब चन्द्रमा इतने बड़े दिगम्बर समुद्र में उथल-पुथल कर विशेष कम्पायमान कर देता है तो हमारे शरीर में जो जलीय अंश है, सप्तधातुएँ हैं, सप्त रंग हैं, उन पर भी चन्द्रमा का प्रभाव पड़ता है । इन दिनों में अगर काम-विकार भोगा तो विकलांग संतान अथवा जानलेवा बीमारी हो जाती है और यदि उपवास, व्रत तथा सत्संग किया तो तन तंदुरुस्त, मन प्रसन्न होता है।

खीर को बनायें अमृतमय प्रसाद...

खीर को रसराज कहते हैं । सीताजी को अशोक वाटिका में रखा गया था । रावण के घर का क्या खायेंगी सीताजी ! तो इन्द्रदेव उन्हें खीर भेजते थे ।

खीर बनाते समय घर में चाँदी का गिलास आदि जो बर्तन हो, आजकल जो मेटल (धातु) का बनाकर चाँदी के नाम से देते हैं वह नहीं, असली चाँदी के बर्तन अथवा असली सोना धोकर खीर में डाल दो तो उसमें रजतक्षार या सुवर्णक्षार आयेंगे । लोहे की कड़ाही अथवा पतीली में खीर बनाओ तो लौह तत्त्व भी उसमें आ जायेगा । खीर में इलायची, खजूर या छुहारा डाल सकते हो लेकिन बादाम, काजू, पिस्ता, चारोली ये रात को पचने में भारी पड़ेंगे । रात्रि 8 बजे महीन कपड़े से ढँककर चन्द्रमा की चाँदनी में रखी हुई खीर 11 बजे के बाद भगवान को भोग लगा के प्रसादरूप में खा लेनी चाहिए । लेकिन देर रात को खाते हैं इसलिए थोड़ी कम खाना । सुबह गर्म करके भी खा सकते हो ।
(खीर दूध, चावल, मिश्री, चाँदी, चन्द्रमा की चाँदनी - इन पंचश्वेतों से युक्त होती है, अतः सुबह बासी नहीं मानी जाती ।) यह खीर खाने से सालभर मनुष्य स्वथ्य रहता है ।
स्वास्थ्य प्रयोग...

इस रात्रि में 3-4 घंटे तक बदन पर चन्द्रमा की किरणों को अच्छी तरह पड़ने दें ।

दो पके सेवफल के टुकड़े करके शरद पूर्णिमा को रातभर चाँदनी में रखने से उनमें चन्द्रकिरणें और ओज के कण समा जाते हैं । सुबह खाली पेट सेवन करने से कुछ दिनों में स्वास्थ्य में आश्चर्यजनक लाभकारी परिवर्तन होते हैं ।

250 ग्राम दूध में 1-2 बादाम व 2-3 छुहारों के टुकड़े करके उबालें । फिर इस दूध को पतले सूती कपड़े से ढँककर चन्द्रमा की चाँदनी में 2-3 घंटे तक रख दें । यह दूध औषधीय गुणों से पुष्ट हो जायेगा । सुबह इस दूध को पी लें ।

सोंठ, काली मिर्च और लौंग डालकर उबाला हुआ दूध चाँदनी रात में 2-3 घंटे रखकर पीने से बार-बार जुकाम नहीं होता, सिरदर्द में लाभ होता है ।
तुलसी के 10-12 पत्ते एक कटोरी पानी में भिगोकर चाँदनी रात में 2-3 घंटे के लिए रख दें । फिर इन पत्तों को चबाकर खा लें व थोड़ा पानी पियें । बचे हुए पानी को छानकर एक-एक बूँद आँखों में डालें, नाभि में मलें तथा पैरों के तलुओं पर भी मलें । आँखों से धुँधला दिखना, बार-बार पानी आना आदि में इससे लाभ होता है । तुलसी के पानी की बूँदें चन्द्रकिरणों के संग मिलकर प्राकृतिक अमृत बन जाती हैं ।

नोट : दूध व तुलसी के सेवन में दो घंटे का अंतर रखें ।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, 'पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः।।
अर्थात में स्वयं अमृतमय चन्द्रमा होकर सम्पूर्ण औषधियों को अर्थात वनस्पतियों को पुष्ट करता हूं।(गीताः15.13)

Sunday, 30 April 2017

मोती धारण करने से पहले यह अवश्य पढ़ें (मोती के लाभ और हानि )

शास्त्रीजी के अनुसार 

मोती कर्क लग्न का आजीवन रत्न है एवम भाग्येश रत्न पुखराज है। मोती रत्न चन्द्रमा की शांति एवम चन्द्रमा को बलवान बनाने के लिए धारण किया जाता है किसी व्यक्ति की कुंडली में चन्द्र बलिष्ठ एवम कमजोर हो सकता है। मान सागरीय के मतानुसार चन्द्रमा को रानी भी कहा गया है। बलिष्ठ चन्द्रमा से व्यकि को राज कृपा मिलती है , उसके राजकीय कार्यो में सफलता मिलती है , मन को हर्षित करता है, विभिन्न प्रकार की चिन्ताओ से मुक्त करता है | ज्योतिषाचार्य के अनुसार ज्योतिष् शास्त्र में चंद्रमा को ब्रह्मांड का मन कहा गया है. हमारे शरीर में भी चंद्रमा हमारे मन व मस्तिष्क का कारक है, विचारों की स्थिरता का प्रतीक है | मन ही मनुष्य का सबसे बड़ा दोस्त या दुश्मन है |माता लक्ष्मी के आशीर्वाद से भरपूर मोती रत्न पहनने से आप लक्ष्मी को अपने द्वार पर आमंत्रित करेंगे। अगर आप की कुंडली में चंद्रमा कमज़ोर है, तो उस को सबल बनाने में आप की मदद करेगा। इस के अलावा अनिद्रा व मधुमेह को नियंत्रण में लाने में भी यह मदद करता है। ज्योतिषाचार्य के अनुसार मोती रत्न आप की याददाश्त को बल देता है। आप के मस्तिष्क को शांति प्रदान करता है। इस के अलावा मोती यौन जीवन में शक्ति प्रदान करने के लिए भी जाना जाता है एवं आप के वैवाहिक जीवन को सुंदर बनाता है।
मोती चंद्रमा का रत्न है. कहा जाता है :- 
कदली, सीप, भुजंग मुख, स्वाती एक, गुण तीन
जैसी संगत बैठियें, तेसोई फल दीन || 
अर्थात स्वाती नक्षत्र के समय बरसात की एक बूंद घोघे के मुख में समाती है तब वह मोती बन जाता है. वही बूंद केले में जा कर कपूर और साँप के मूह में जा कर हाला हाल विष बनती है |
रसायनिक दृष्टि से इसमे , केल्षीयम, कार्बन और आक्सीज़न,यह तीन तत्व पाए जाते है. आयुर्वेद के अनुसार मोती में 90% चूना होता है, इसलिए कैल्शियम् की कमी के कारण जो रोग उत्पन्न होते है उनमें लाभ करता है. नेत्र रोग, स्मरण शक्ति को बढ़ाने के लिए, पाचन शक्ति को तेज़ करने के लिए व हृदय को बल देने के लिए मोती धारण करना चाहिए | ज्योतिषाचार्य के अनुसार सामान्यत: चंद्रमा क्षीण होने पर मोती पहनने की सलाह दी जाती है मगर हर लग्न के लिए यह सही नहीं है। ऐसे लग्न जिनमें चंद्रमा शुभ स्थानों (केंद्र या‍ त्रिकोण) का स्वामी होकर निर्बल हो,ऐसे में ही मोती पहनना लाभदायक होता है। अन्यथा मोती भयानक डिप्रेशन, निराशावाद और आत्महत्या तक का कारक बन सकता है।  
ज्योतिषाचार्य के अनुसार सामान्य तोर पर लोग मोती रत्न पहन लेते है , जब उनसे पूछा जाता है की यह रत्न आपने क्यों पहना तो 95 प्रतिशत लोगो का जबाब होता है की मुझे गुस्सा बहुत आता है , गुस्सा शांत रहे इसलिए पहना हैयह बिलकुल गलत है ! मोती रत्न चन्द्रमा ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है , और यह ग्रह आपकी जन्मकुंडली में शुभ भी हो सक्ता है और अशुभ भी ! यदि चंद्रमा शुभ ग्रहों के साथ शुभ ग्रहों की राशि में और शुभ भाव में बैठा होगा तो निश्चित ही मोती रत्न आपको फायदा पहुचाएगा ! इसके विपरीत अशुभ ग्रहों के साथ होने से शत्रु ग्रहों के साथ होने से मोती नुसकान भी पंहुचा सकता है |
जैसे मोती रत्न को यदि मेष लग्न का जातक धारण करे, तो उसे लाभ प्राप्त होगा। कारण मेष लग्न में चतुर्थ भाव का स्वामी चंद्र होता है। चतुर्थेश चंद्र लग्नेश मंगल का मित्र है। चतुर्थ भाव शुभ का भाव है, जिसके परिणामस्वरूप वह मानसिक शांति, विद्या सुख, गृह सुख, मातृ सुख आदि में लाभकारी होगा। यदि मेष लग्न का जातक मोती के साथ मूंगा धारण करे, तो लाभ में वृद्धि होगी। 
मोती धारण करने से व्यक्ति में सौम्यता व शीतलता का उदय होता है, मन एकाग्र होता है ओवर थिंकिंग, नेगेटिव थिंकिंग, मानसिक तनाव, एंग्जायटी और डिप्रेशन जैसी समस्याओं में मोती धारण करने से लाभ होता है इसके अलावा लंग्स से जुडी समस्या, अस्थमा, माइग्रेन, साइनस की समस्या, शीत रोग तथा मानसिक रोगों में भी मोती धारण करने से लाभ होता है तथा मानसिक अस्थिरता से व्यक्ति एकाग्रता की और बढ़ने लगता है स्थूल रूप में कहा जाये तो मोती धारण करने से पीड़ित या कमजोर चन्द्रमाँ  के सभी दुष्प्रभावों में लाभ व सकारात्मक परिवर्तन होता है। परंतु आब यहाँ सबसे विशेष बात यही है के प्रत्येक व्यक्ति को मोती धारण नहीं करना चाहिए मोती धारण करना सभी व्यक्तियों के लिए शुभ हो ऐसा बिलकुल भी आवश्यक नहीं है अधिकांश लोग की सोच होती है के मोती तो सौम्य प्रवर्ति का रत्न है और इसे धारण करने से तो मानसिक शांति मिलती है इसलिए हमें भी मोती धारण कर लेना चाहिए पर यहाँ यह बड़ी विशेष बात है के बहुतसी स्थितियों में मोती आपके लिए मारक रत्न का कार्य भी कर सकता है और मोती धारण करने पर बड़े स्वास्थ कष्ट, बीमारियां, दुर्घटनाएं और संघर्ष बढ़ सकता है इसलिए अपनी इच्छा से बिना किसी योग्य ज्योतिषी की सलाह के मोती नहीं धारण करना चाहिए, वास्तव में कुंडली में चन्द्रमाँ कमजोर होने पर मोती धारण की सलाह केवल उन्ही व्यक्तियों को दी जाती है जिनकी कुंडली में चन्द्रमाँ शुभ कारक ग्रह होता है, क्योंकि मोती धारण करने से कुंडली में चन्द्रमाँ की शक्ति बहुत बढ़ जाती है और ऐसे में यदि चन्द्रमाँ कुंडली का अशुभ फल देने वाला ग्रह हुआ तो मोती पहनना व्यक्ति के लिए बहुत हानिकारक सिद्ध होगा इसलिए किसी योग्य ज्योतिषी से अपनी कुंडली का विश्लेषण कराने के बाद की मोती धारण करना चाहिए और यदि चन्द्रमाँ आपकी कुंडली का शुभ कारक ग्रह है तो निःसंदेह मोती धारण से बहुत शुभ परिणाम प्राप्त होंगे
ज्योतिषाचार्य के अनुसार मोती, चन्द्र गृह का प्रतिनिधित्व करता है! कुंडली में यदि चंद्र शुभ प्रभाव में हो तो मोती अवश्य धारण करना चाहिए | चन्द्र मनुष्य के मन को दर्शाता है, और इसका प्रभाव पूर्णतया हमारी सोच पर पड़ता है| हमारे मन की स्थिरता को कायम रखने में मोती अत्यंत लाभ दायक सिद्ध होता है| इसके धारण करने से मात्री पक्ष से मधुर सम्बन्ध तथा लाभ प्राप्त होते है! मोती धारण करने से आत्म विश्वास में बढहोतरी भी होती है | हमारे शरीर में द्रव्य से जुड़े रोग भी मोती धारण करने से कंट्रोल किये जा सकते है जैसे ब्लड प्रशर और मूत्राशय के रोग , लेकिन इसके लिए अनुभवी ज्योतिष की सलाह लेना अति आवशयक है, क्योकि कुंडली में चंद्र अशुभ होने की स्तिथि में मोती नुक्सान दायक भी हो सकता है | पागलपन जैसी बीमारियाँ भी कुंडली में स्थित अशुभ चंद्र की देंन होती है , इसलिए मोती धारण करने से पूर्व यह जान लेना अति आवशयक है की हमारी कुंडली में चंद्र की स्थिति क्या है ? छोटे बच्चो के जीवन से चंद्र का बहुत बड़ा सम्बन्ध होता है क्योकि नवजात शिशुओ का शुरवाती जीवन , उनकी कुंडली में स्थित शुभ या अशुभ चंद्र पर निर्भर करता है! यदि नवजात शिशुओ की कुंडली में चन्द्र अशुभ प्रभाव में हो तो बालारिष्ठ योग का निर्माण होता है | फलस्वरूप शिशुओ का स्वास्थ्य बार बार खराब होता है, और परेशानिया उत्त्पन्न हो जाती है , इसीलिए कई ज्योतिष और पंडित जी अक्सर छोटे बच्चो के गले में मोती धारण करवाते है | कुंडली में चंद्रमा के बलि होने से न केवल मानसिक तनाव से ही छुटकारा मिलता है वरन् कई रोग जैसे पथरी, पेशाब तंत्र की बीमारी, जोड़ों का दर्द आदि से भी राहत मिलती है।   
ज्योतिषाचार्य ने बताया की स्त्रियो के नथुनी में मोती धारण करने से लज्जा लावारण अखंड सोभाग्य की प्राप्ति होती है और पति पत्नी में प्रेम प्रसंग या प्रेमिका को पाने के लिए मोती रत्न धारण करने से प्रेम परवान चढ़ाता है। मोती रत्न धारण करने से उदर रोग भी ठीक होता है जिस जातक का बलिष्ठ चन्द्रमा हो , सुख और समृद्धि प्रदान कर रहा हो , माता की लम्बी आयु वाले व्यक्तिओ को चन्द्र की वास्तुओ का दान नही लेना चाहिए | द्रव्य से जुड़े व्यावसायिक और नोकरी पेशा लोगों को मोती अवश्य धारण करना चाहिए , जैसे दूध और जल पेय आदि के व्यवसाय से जुड़े लोग , लेकिन इससे पूर्व कुंडली अवश्य दिखाए |
ज्योतिषाचार्य के मुताबिक इसके साथ साथ वृषभ लग्न के जातकों को मोती से हमेशा दूरी बनाए रखना चाहिए, क्योंकि इस लग्न के जातकों के लिए मोती शुभता प्रदान नहीं करता है। मोती यूं तो शांति का कारक माना गया है लेकिन मोती को भी बगैर ज्योतिषीय सलाह से बिल्कुल भी धारण नहीं करना चाहिए। इसी तरह मिथुन लग्न वालों के लिए भी मोती अशुभ है तो वहीं सिंह लग्न के लिए भी मोती का प्रभाव अशुभ रूप से ही सामने आता है। 
ज्योतिष् शास्त्र के अनुसार रत्नों का हमारे जीवन पर विशेष महत्व रहता है. कोई भी रत्न हमारे जीवन पर किसी न किसी रूप में प्रभाव डालता है. यदि वह शुभ ग्रह का हो तो जीवन सुखमय व परिपूर्ण लगने लगता है और यदि वह ग्रह अशुभ हो तो जीवन में कठिनाइयां बढ़ती जाती है |
अमावस्या के दिन जन्में जातक मोती धारण करेंगे तो उन्हें शुभ फलों की प्राप्ति होगी।
–  राहू के साथ ग्रहण योग निर्मित होने पर मोती अवश्य ग्रहण धारण करना चाहिए।
कुंडली में चंद्र छठे अथवा आठवें भाव में हो तो मोती पहनने से सकारात्मकता का संचार होता है।
कारक अथवा लग्नेश चंद्र नीच का हो तो मोती पहनें।
इसके अलावा धनु लग्न में जन्में व्यक्ति को भी मोती पहनने से हमेशा हानि ही सामने आती हे तो वहीं ऐसी ही अनिष्टकारी स्थिति कुंभ लग्न वालों के लिए भी कही जाती है। मोती के साथ न तो हीरा  धारण करना चाहिए और न ही पन्ना या नीलम या फिर गोमेद मोती के साथ अनुकुलता प्रदान करता है। क्योंकि उपरोक्त सभी रत्न मोती के विपरित स्वभाव वाले है।यदि चंद्रमा कमज़ोर स्थिति में हो मनुष्य में बैचेनी, दिमागी अस्थिरता, आत्मविश्वास की कमी होती है और इसी कमी के चलते वह बार-बार अपना लक्ष्य बदलता रहता है. जिस के कारण सदैव असफलता ही हाथ लगती है. चंद्रमा आलस्य, कफ, दिमागी असंतुलन, मिर्गी, पानी की कमी, आदि रोग उत्पन्न करता है . यह पानी का प्रतिनिधि ग्रह है. मोती की उत्पत्ति भी पानी में और पानी के द्वारा ही होती है |चंद्रमा यदि आपकी कुंडली के अनुसार शुभ स्थिति में हो तो व्यक्ति शारीरिक रूप से पुष्ट, सुंदर, विनोद प्रिय , सहनशील, भावनाओं की कद्र करने वाला, सच्चा होता है|
ज्योतिषाचार्य के अनुसार यदि आप चंद्र देव का रत्न मोती धारण करना चाहते है, तो 5 से 8 कैरेट के मोती को चाँदी की अंगूठी में जड्वाकर किसी भी शुक्लपक्ष के प्रथम सोमवार को सूर्य उदय के पश्चात अंगूठी को दूध, गंगा जल, शक्कर और शहद के घोल में डाल दे | उसके बाद पाच अगरबत्ती चंद्रदेव के नाम जलाये और प्रार्थना करे की हे चन्द्र देव मै आपका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए आपका प्रतिनिधि रत्न, मोती धारण कर रहा हूँ , कृपया करके मुझे आशीर्वाद प्रदान करे, तत्पश्चात अंगूठी को निकाल कर ॐ सों सोमाय नम:मंत्र का 108 बार जप करते हुए अंगूठी को शिवजी के चरणों से लगाकर कनिष्टिका  ऊँगली में धारण करे | यथा संभव मोती धारण करने से पहले किसी ब्राह्मण ज्योतिषी से अपनी कुंडली में चंद्रमा की शुभता का अशुभता के बारे में पूरी जानकारी लेनी चाहिए. मोती रत्न शुक्ल पक्ष के सोमवार या किसी विशेष महूर्त के दिन ब्राह्मण के द्वारा शुद्धीकरण व प्राण प्रतिष्ठा के बाद ही धारण करना चाहिए |
वैसे मोती अपना प्रभाव  जिस दिन मोती धारण किया जाता है उस दिन से 4 दिन के अंदर-अंदर वह अपना प्रभाव देना शुरू कर देता है और औसतन 2 साल एक महीना व 27 दिन में पूरा प्रभाव देता है तत्पश्चात निष्क्रिय होता है। अत: समय पूर्ण होने पर मोती बदलते रहें।वैसे मोती अपना प्रभाव 4 दिन में देना आरम्भ कर देता है, और लगभग 2 वर्ष तक पूर्ण प्रभाव देता है फिर निष्क्रिय हो जाता है |2 वर्ष के पश्चात् पुनः नया मोती धारण करे |अच्छे प्रभाव प्राप्त करने के लिए साऊथ सी का 5 से 8 कैरेट का मोती धारण करे | मोती का रंग सफ़ेद और कोई काला दाग नहीं होना चाहिए | किन्हीं विशेष परिस्थितियों में मोती बदलने में असमर्थ हों तो उसी अंगूठी को गुनगुने पानी में चुटकी भर शुद्ध नमक डालकर अंगूठी की ऋणात्मक शक्ति को खत्म करें। फिर शुद्ध होने पर अंगूठी को शिवालय लेकर जाएं शिवलिंग पर उसको छुआएं तथा मंदिर में खड़े होकर ही उसे धारण कर लें।
मोती को चाँदी की अंगूठी में बनवाकर सीधे हाथ की कनिष्ठा या अनामिका उंगली में धारण कर सकते हैं इसके अतिरिक्त सफ़ेद धागे या चांदी की चेन के साथ लॉकेट के रूप में गले में भी धारण कर सकते हैं मोती को सोमवार के दिन प्रातः काल सर्व प्रथम गाय के कच्चे दूध व गंगाजल से अभिषेक करके धुप दीप जलाकर चन्द्रमाँ के मन्त्र का तीन माला जाप करना चाहिए फिर पूर्व या उत्तर दिशा की और मुख करके मोती धारण कर लेना चाहिए।
मोती धारण मन्त्र ॐ सोम सोमाय नमः


घड़ी भी बदल सकती है आपका बुरा समय

क्या आपने कभी सोचा है कि दीवार पर टंगी घंड़ियां भी आपके घर में सुख-समृद्धि का कारण बन सकती है| वास्तुशास्त्री श्री सिंह के अनुसार घड़ी की सूईयां एवं पेंडुलम से सकारात्मक उर्जा का संचार होता है. घर में कभी भी बंद घड़ी नहीं रखनी चाहिए बंद घडी से घर की उन्नति रुक जाती है. चलती हुई घडी निरन्तर विकास का प्रतीक होती है. घरों में लगाई जाने जाने वाली घड़िया हमारे जीवन में महत्तवपूर्ण रोल निभाती है |ज्योतिष और वास्तु की बात करें, तो ये अद्वितीय शास्त्र हमें ये ज्ञान देते हैं कि चाहे कैसी भी विपरीत परिस्थितियाँ क्यूँ ना हों, ज्योतिष और वास्तु की सहायता से इन दोषों को कम किया जा सकता है और अपने विपरीत परिस्थितयों को अपने अनुकूल बनाया जा सकता है |
वास्तुशास्त्री श्री सिंह के मुताबिक वास्तु शास्त्र में घड़ी लगाने के भी कुछ नियम बताए गए है। गलत ढंग से लगाई गई घड़ी आपका नुकसान करवा सकती है। वास्तुशास्त्री श्री सिंह के अनुसार सुनकर शायद यकीन न करें लेकिन यह सच है कि दीवाल पर टंगी घंड़ियां भी घर में सुख-समृद्धि लाती हैं। वास्तु शास्त्र  के अनुसार घड़ी की सूईयां एवं पेंडुलम से सकारात्मक उर्जा का संचार होता है। इसलिए कभी भी घर में बंद घड़ी नहीं रखें इससे उन्नति रूक जाती है।
वास्तुशास्त्री श्री सिंह के अनुसार घड़ी का चलते रहना निरन्तर विकास का प्रतीक है। समय से पीछे चलती घड़ी भी वास्तु शास्त्र के अनुसार सही नहीं होती है। व्यवहारिक जीवन में भी घड़ी का समय से पीछे चलना कई बार परेशानी का करण बनता है इसलिए घड़ी का समय सही रखें। घड़ी टांगने का संबंध समय देखने के अलावा घर की साज-सज्जा से भी है। तीसरी बात यह है कि उचित और वास्तु सम्मत स्थान पर घड़ी टांगने से उस कमरे या घर के लोगों का जीवन जहां अनुशासित रहता है, वहीं समय की गति के साथ उनका जीवन भी क्रियाशील यानी एक्टिव रहता है।
घर की बनावट के अनुसार ही दीवार घड़ी या टाइम पीस को लगाने का प्रावधान करना चाहिए। अगर आपके पास छोटा और सीमित आकार वाला घर हो, तो सिर्फ ड्राइंग रूम में ही वॉल-क्लॉक लगाना चाहिए।
जानिए घड़ी को कहां पर लगाएं ???
वास्तुशास्त्री श्री सिंह के अनुसार घड़ी कभी भी दक्षिण दिशा वाली दीवार पर नहीं लगाएं। दक्षिण दिशा को वास्तु शास्त्र  में  शुभ नहीं माना गया है क्योंकि यह यम की दिशा होती है। विज्ञान के अनुसार इस दिशा में निगेटिव एनर्जी होती है। दक्षिण दिशा की दीवार पर घड़ी होने से बार-बार आपका ध्यान इस दिशा की ओर जाएगा। इससे बार-बार दक्षिण दिशा की नकारात्मक उर्जा आप प्राप्त करेंगे।
वास्तुशास्त्री श्री सिंह के अनुसार घड़ी को कभी भी मुख्य द्वार के ठीक सामने अथवा दरवाजे के ऊपर नहीं लगाना चाहिए। इससे घर से बाहर आते और जाते समय आपके आस-पास की उर्जा प्रभावित होती है। इसके परिणामस्वरूप तनाव बढ़ता है। कुछ लोग सोते समय घड़ी तकिया के नीचे रख लेते हैं। ऐसा करने से घड़ी की टिक-टिक से नींद खराब होती है। 
वास्तुशास्त्री श्री सिंह के मुताबिक आजकल जो भी घड़ियां आती हैं वह आमतौर पर बैट्री से चलती हैं। इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से जो इलेक्ट्रो-मैग्नेनिटक तरंग निकलता है उसका प्रभाव मस्तिष्क एवं हृदय पर पड़ता है। इसलिए फेंगशुई के साथ वैज्ञानिक दृष्टि से भी तकिये के नीचे घड़ी रखना अच्छा नहीं माना जाता है। ।
जानिए घड़ी की सही दिशा
वास्तुशास्त्री श्री सिंह के अनुसार घडी को दीवार पर लगाने के लिए उत्तर, पूर्व एवं पश्चिम दिशा को आदर्श माना जाता है। इन दिशाओं को पोजेटिव एनर्जी प्रदान करने वाला माना जाता है। ड्रांईंग रूम या बेडरूम में घड़ी ऐसे लगाएं ताकि रूम में प्रवेश करने पर घड़ी पर नज़र जाए। यह भी ध्यान रखें कि घड़ी पर धूल-मिट्टी न जमे।  मधुर संगीत उत्पन्न करने वाली दीवार घड़ी घर के मुख्य हॉल में लगानी चाहिए। इससे सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि होती है। 
जानिए इसके साथ ही साथ क्या करें और क्या न करें ?
दक्षिण दिशा में घड़ी कदापि न लगायें .
घर के मुख्य दरवाज़े के ऊपर भी घड़ी कभी न लगायें.
बंद पड़ी हुयी घड़ियों को यथाशीघ्र सही करवाएं .
यदि घड़ी बिलकुल ख़राब हो गयी हो तो घर में ना रखें .
किसी भी रिश्तेदार को भूल कर भी गिफ्ट में घड़ी ना दें .
यदि घड़ी का समय आगे या पीछे हो गया हो तो उसे सही समय से मिला लें .
घड़ी का समय आगे या पीछे न रखें .
दीवार घड़ी पर कभी धुल न जमने दें, समय समय पे उसे साफ़ करते रहा करें .
घर का माहौल खुशनुमा बनाये रखने के लिए उन घड़ियों को लगायें जिनकी संगीत मधुर हो .
सोते समय तो हरगिज़ भी तकिये के नीचे कोई भी घड़ी न रखें .
घर के पूर्व, उत्तर और पश्चिम में ही घड़ी लगायें .
-घर के ड्राइंग रूम में पेंडुलम वाली घड़ियाँ लगाने से सौभ्य वृधि होती है .
गोल, आयताकार घड़ियाँ शुभ प्रभाव लाती हैं.
जानिए कौन सी घड़ी लकी है—-
वास्तुशास्त्री श्री सिंह के अनुसार घड़ियों का आकार वास्तु शास्त्र में काफी मायने रखता है। इसलिए जब अब घड़ी खरीद रहे हों तो इस बात का ध्यान रखें कि क्या आपकी घड़ी वास्तु शास्त्र के अनुसार आपके लिए लकी है। वास्तु शास्त्र के अनुसार अंडाकार, गोल, अष्टभुजाकार और षट्भुजाकार एवम आयताकार घड़ियाँ शुभ प्रभाव लाती हैं |
जानिए घडी लगते समय क्या रखें सावधानिया
—-स्टडी रूम में पूर्व या वायव्य कोण में घड़ी लगाना सर्वोत्तम रहेगा। इससे जहां वहां कार्यरत अध्ययनकर्ता की एकाग्रता बनी रहेगी, वहीं उनका समय भी फालतू कार्यों और दिमागी उलझनों में बर्बाद नहीं होगा।
—-वास्तुशास्त्री श्री सिंह के अनुसार ड्राइंग रूम में पूर्व या वायव्य कोण में दीवार घड़ी लगाने से घर के सदस्यों की शारीरिक और मानसिक ऊर्जा गतिमान रहेगी। उनके जीवन में नवीनता और गतिशीलता आएगी। पूर्व दिशा में लगाई गई दीवार घड़ी उनको सदैव समय पर जागृत रखेगा और किसी भी आकस्मिक घटना-दुर्घटना के प्रति वे समय रहते सचेत हो जाएंगे। साथ ही घर के सदस्यों का जीवंत व्यवहार बैठक यानी ड्राइंग रूम को आबाद रखेगा और उसमें साज-सज्जा के नए-नए और आधुनिक वास्तु सामग्री का संग्रह होता ही रहेगा। अच्छा ड्राइंग रूम गृहस्थ के सुविचार और अच्छे टेस्ट का प्रतीक बनेगा।
—-यदि ड्राइंग रूम के उत्तर की ओर दीवार घड़ी लगाते हैं, तो आर्थिक कार्य समय पर बनते रहेंगे। घर में धन की आवक समय पर होगी, लेकिन उत्तर की ओर पितर और देवताओं का वास होता है। अत: किसी देवी-देवता की चित्र या फोटो प्रतीक लगी हुई दीवार घड़ी लगाई जाए, तो ड्राइंग की साज-सज्जा में चार चांद लग जाएंगे।
—-वायव्य कोण बदलाव का प्रतीक है। हवा यानी वायु हर समय इस दिशा को साफ करती है। इस दिशा में अगर घड़ी लगाना हो, तो सादा और गोलाकार या अंडाकार नमूने की ही घड़ी लगानी चाहिए, ताकि समय की गति और बदलाव के अच्छे और सुखद क्षण बार-बार आते रहें। जिस प्रकार हवा गोल दायरे में चक्कर काटती है, वैसे ही मानव जीवन भी एक आवृति लिए रहता है। उसमें दुख-सुख अपना चक्कर पूरा करते रहते हैं।
वास्तुशास्त्री श्री सिंह के अनुसार यह भी ध्यान रहे कि जहां भी घड़ी लगाई जा रही है, वहां या उसके आसपास शेर, भालू, सियार गिद्द, सुअर, घडि़याल, बाघ, चीता या सांप आदि परभक्षी व खतरनाक प्राणियों के चित्र नहीं लगाने चाहिए। इससे जहां समय की धारा विरुद्ध हो जाती है, वहीं अन्य प्रकार के वास्तु-दोष घर के सदस्यों की कार्यक्षमता को प्रभावित करते हैं।
—-वास्तुशास्त्री श्री सिंह के अनुसार बेडरूम में सदैव उत्तर या उत्तरपूर्व दिशा में ही घड़ी लगानी चाहिए। वैसे, यहां अधिक खटपट करने वाली क्लॉक नहीं लगानी चाहिए और न ही अलार्म रहित घड़ी। हां, प्रत्येक घंटे चेतावनी देने वाली टबिल क्लॉक बेड रूम में लगाना अच्छा नहीं रहेगा। इससे नींद में खलल पड़ेगा।
—-वास्तु शास्त्र के अनुसार कभी भी घर के मुख्य द्वार या दरवाजे के ऊपर घड़ी लगाना भी शुभ नहीं माना गया है. घर के मुख्य द्वार पर घडी लगाने से घर में तनाव बढ़ता है |
घर में बहुत पुरानी या बार-बार खराब होने वाली और धुंधले शीशे वाली घड़ियां भी नहीं लगनी चाहिए ये की सफलता में बाधक है |
—-आजकल बाजार में जो घड़िया आयी है वह अधिकतर बैट्री से चलती हैं. इन इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से जो इलेक्ट्रो-मैग्नेनिटक तरंग निकलती है ये हमारे मस्तिष्क एवं हृदय पर बुरा प्रभाव डालती है वास्तुशास्त्र के अनुसार और वैज्ञानिक दृष्टि से ऐसी घड़ियों को तकिये के नीचे नहीं रखना चाहिए |
—-ऑफिस या कार्यस्थल पर लगाई जाने वाली घडी का साइज कुछ बड़ा होना चाहिए ये गाड़ी दिखने में साफ़ सुथरी होनी चाहिए. बहुत पुरानी और रुक-रुक कर चलने वाली घड़ी कार्यालय में नेगेटिव ऊर्जा लाती है |
दीवार की घडी पर कभी भी धूल-मिट्टी न जमने दे समय-समय पर घडी पर जमी धूल मिटटी को साफ़ करते रहे |
—-यदि घडी का शीशा टूटा हो तो उसे समय पर बदल देना चहिये अन्यथा घर में नेगेटिव ऊर्जा आती है|
—-घड़ी को घर पर ऐसे स्थान में लगाए जहा से सभी को आसानी से दिखाई दे |

—-कभी भी बेड के सिरहाने वाली दीवार पर कोई घड़ी या फोटो फ्रेम न लगाए इससे घर के सदस्यों में सर दर्द की समस्या बनी रहती है